कविता संग्रह

अकेले हैं वो और झुंझला रहे हैं    – ख़ुमार बाराबंकवी

अकेले हैं वो और झुंझला रहे हैं  मेरी याद से जंग फ़रमा रहे हैं  इलाही मेरे दोस्त हों ख़ैरियत से  ये क्यूँ घर में पत्थर नहीं आ रहे हैं 

बिना सूई की घड़ियाँ – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

हलके नीले और राख के से रंग में जो रँगी हुई। है नभ की दीवाल, वहाँ पर गोल घड़ी जो टँगी हुई।। अम्माँ देखो तो वह कितनी सुंदर चाँदी-सी उज्ज्वल। लगता जैसे वाच फैक्ट्री से आई हो अभी निकल।। पर अम्माँ यह घड़ी अजब है,

ग़मे-दुनिया बहुत ईज़ारशाँ है – ख़ुमार बाराबंकवी

ग़मे-दुनिया बहुत ईज़ारशाँ है  कहाँ है ऐ ग़मे-जानाँ! कहाँ है  इक आँसू कह गया सब हाल दिल का मैं समझा था ये ज़ालिम बेज़बाँ है 

हम हैं सूरज-चाँद-सितारे – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

हम हैं सूरज-चाँद-सितारे।। हम नन्हे-नन्हे बालक हैं, जैसे नन्हे-नन्हे रजकण। हम नन्हे-नन्हे बालक हैं, जैसे नन्हे-नन्हे जल-कण। लेकिन हम नन्हे रजकण ही, हैं विशाल पर्वत बन जाते। हम नन्हे जलकण ही,

जीवन का दिन – हरिवंशराय बच्चन

जीवन का दिन बीत चुका था, छाई थी जीवन की रात, किंतु नहीं मैंने छोड़ी थी आशा-होगा पुनः प्रभात। काल न ठंडी कर पाया था, मेरे वक्षस्थल की आग, तोम तिमिर के प्रति विद्रोही बन उठता हर एक चिराग़।

मैं सुमन हूँ – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

व्योम के नीचे खुला आवास मेरा; ग्रीष्म, वर्षा, शीत का अभ्यास मेरा; झेलता हूँ मार मारूत की निरंतर,  खेलता यों जिंदगी का खेल हंसकर।  शूल का दिन रात मेरा साथ किंतु प्रसन्न मन हूँ मैं सुमन हूँ...

मुझ को शिकस्त-ए-दिल   – ख़ुमार बाराबंकवी

मुझ को शिकस्त-ए-दिल का मज़ा याद आ गया  तुम क्यों उदास हो गए क्या याद आ गया  कहने को ज़िन्दगी थी बहुत मुख़्तसर मगर  कुछ यूँ बसर हुई कि ख़ुदा याद आ गया  वाइज़ सलाम ले कि चला मैकदे को मैं  फिरदौस-ए-गुमशुदा का पता याद आ गया 

यदि होता किन्नर नरेश मैं – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

यदि होता किन्नर नरेश मैं राज महल में रहता, सोने का सिंहासन होता सिर पर मुकुट चमकता। बंदी जन गुण गाते रहते दरवाजे पर मेरे, प्रतिदिन नौबत बजती रहती संध्या और सवेरे।

हम सब सुमन एक उपवन के – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

हम सब सुमन एक उपवन के एक हमारी धरती सबकी जिसकी मिट्टी में जन्मे हम मिली एक ही धूप हमें है सींचे गए एक जल से हम। पले हुए हैं झूल-झूल कर पलनों में हम एक पवन के हम सब सुमन एक उपवन के।।

आग न जलने देना – रमानाथ अवस्थी

जो आग जला दे भारत की ऊँचाई, वह आग न जलने देना मेरे भाई । तू पूरब का हो या पश्चिम का वासी तेरे दिल में हो काबा या हो काशी तू संसारी हो चाहे हो संन्यासी तू चाहे कुछ भी हो पर भूल नहीं तू सब कुछ पीछे पहले भारतवासी ।