भालू आया – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

लाठी लेकर भालू आया छम-छम छम-छम छम-छम-छम डुग-डुग डुग-डुग बजी डुगडुगी डम-डम डम-डम डम-डम-डम

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मुन्ना-मुन्नी – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

मुन्ना-मुन्नी ओढ़े चुन्नी, गुड़िया खूब सजाई किस गुड्डे के साथ हुई तय इसी आज सगाई मुन्ना-मुन्नी ओढ़े चुन्नी, कौन खुशी की बात है, आज तुम्हारी गुड़िया प्यारी की क्या चढ़ी बरात है!

माँ! यह वसंत ऋतुराज री! – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

आया लेकर नव साज री ! मह-मह-मह डाली महक रही कुहु-कुहु-कुहु कोयल कुहुक रही संदेश मधुर जगती को वह देती वसंत का आज री! माँ! यह वसंत ऋतुराज री!

बिना सूई की घड़ियाँ – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

हलके नीले और राख के से रंग में जो रँगी हुई। है नभ की दीवाल, वहाँ पर गोल घड़ी जो टँगी हुई।। अम्माँ देखो तो वह कितनी सुंदर चाँदी-सी उज्ज्वल। लगता जैसे वाच फैक्ट्री से आई हो अभी निकल।। पर अम्माँ यह घड़ी अजब है,

हम हैं सूरज-चाँद-सितारे – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

हम हैं सूरज-चाँद-सितारे।। हम नन्हे-नन्हे बालक हैं, जैसे नन्हे-नन्हे रजकण। हम नन्हे-नन्हे बालक हैं, जैसे नन्हे-नन्हे जल-कण। लेकिन हम नन्हे रजकण ही, हैं विशाल पर्वत बन जाते। हम नन्हे जलकण ही,

मैं सुमन हूँ – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

व्योम के नीचे खुला आवास मेरा; ग्रीष्म, वर्षा, शीत का अभ्यास मेरा; झेलता हूँ मार मारूत की निरंतर,  खेलता यों जिंदगी का खेल हंसकर।  शूल का दिन रात मेरा साथ किंतु प्रसन्न मन हूँ मैं सुमन हूँ...

यदि होता किन्नर नरेश मैं – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

यदि होता किन्नर नरेश मैं राज महल में रहता, सोने का सिंहासन होता सिर पर मुकुट चमकता। बंदी जन गुण गाते रहते दरवाजे पर मेरे, प्रतिदिन नौबत बजती रहती संध्या और सवेरे।

हम सब सुमन एक उपवन के – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

हम सब सुमन एक उपवन के एक हमारी धरती सबकी जिसकी मिट्टी में जन्मे हम मिली एक ही धूप हमें है सींचे गए एक जल से हम। पले हुए हैं झूल-झूल कर पलनों में हम एक पवन के हम सब सुमन एक उपवन के।।

चंदा मामा, आ जाना – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

चंदा मामा, आ जाना, साथ मुझे कल ले जाना। कल से मेरी छुट्टी है ना आये तो कुट्टी है। चंदा मामा खाते लड्डू, आसमान की थाली में। लेकिन वे पीते हैं पानी आकर मेरी प्याली में।

कौन सिखाता है – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

कौन सिखाता है चिड़ियों को चीं-चीं, चीं-चीं करना?  कौन सिखाता फुदक-फुदक कर उनको चलना फिरना? कौन सिखाता फुर्र से उड़ना दाने चुग-चुग खाना? कौन सिखाता तिनके ला-ला कर घोंसले बनाना? कौन सिखाता है बच्चों का लालन-पालन उनको? माँ का प्यार, दुलार, चौकसी कौन सिखाता उनको?