कविता संग्रह

देखे मैं छबी आज अति बिचित्र हरिकी – सूरदास

देखे मैं छबी आज अति बिचित्र हरिकी ॥ध्रु०॥ आरुण चरण कुलिशकंज । चंदनसो करत रंग।

समुद्र का पानी – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

बहुत दूर पर  अट्टहास कर  सागर हँसता है।  दशन फेन के,  अधर व्योम के।  ऐसे में सुन्दरी! बेचने तू क्या निकली है,  अस्त-व्यस्त, झेलती हवाओं के झकोर सुकुमार वक्ष के फूलों पर ?

वातायन – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

मैं झरोखा हूँ।  कि जिसकी टेक लेकर  विश्व की हर चीज बाहर झाँकती है।  पर, नहीं मुझ पर,  झुका है विश्व तो उस जिन्दगी पर  जो मुझे छूकर सरकती जा रही है।

हिन्दी भाषा – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

पड़ने लगती है पियूष की शिर पर धारा। हो जाता है रुचिर ज्योति मय लोचन-तारा। बर बिनोद की लहर हृदय में है लहराती। कुछ बिजली सी दौड़ सब नसों में है जाती। आते ही मुख पर अति सुखद जिसका पावन नामही। इक्कीस कोटि-जन-पूजिता हिन्दी भाषा है वही।1। जिसने जग में जन्म दिया औ पोसा, पाला। जिसने यक यक लहू बूँद में जीवन डाला। उस माता के शुचि मुख से जो भाषा सीखी। उसके उर से लग जिसकी मधुराई चीखी। जिसके तुतला कर कथन से सुधाधार घर में बही। क्या उस भाषा का मोह कुछ हम लोगों को है नहीं।2।

झील – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

मत छुओ इस झील को।  कंकड़ी मारो नहीं,  पत्तियाँ डारो नहीं,  फूल मत बोरो।  और कागज की तरी इसमें नहीं छोड़ो। 

झुकी झुकी सी नज़र – कैफ़ि आज़मी

झुकी झुकी सी नज़र बेक़रार है कि नहीं  दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं  तू अपने दिल की जवाँ धड़कनों को गिन के बता  मेरी तरह तेरा दिल बेक़रार है कि नहीं 

दिल्ली – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

यह कैसी चांदनी अम के मलिन तमिस्र गगन में कूक रही क्यों नियति व्यंग से इस गोधूलि-लगन में ? मरघट में तू साज रही दिल्ली कैसे श्रृंगार? यह बहार का स्वांग अरी इस उजड़े चमन में!

हम उन्हें वो हमें भुला बैठे – ख़ुमार बाराबंकवी

हम उन्हें वो हमें भुला बैठे दो गुनहगार ज़हर खा बैठे हाल-ऐ-ग़म कह-कह के ग़म बढ़ा बैठे तीर मारे थे तीर खा बैठे आंधियो जाओ अब आराम करो हम ख़ुद अपना दिया बुझा बैठे

सजनि दीपक बार ले – महादेवी वर्मा

उर तिमिरमय घर तिमिरमय चल सजनि दीपक बार ले! राह में रो रो गये हैं रात और विहान तेरे काँच से टूटे पड़े यह  स्वप्न, भूलें, मान तेरे; फूलप्रिय पथ शूलमय पलकें बिछा सुकुमार ले!

वो सवा याद आये – ख़ुमार बाराबंकवी

वो सवा याद आये भुलाने के बाद  जिंदगी बढ़ गई ज़हर खाने के बाद  दिल सुलगता रहा आशियाने के बाद  आग ठंडी हुई इक ज़माने के बाद  रौशनी के लिए घर जलाना पडा  कैसी ज़ुल्मत बढ़ी तेरे जाने के बाद