सुरसरि सी सरि है कहाँ मेरु सुमेर समान। जन्मभूमि सी भू नहीं भूमण्डल में आन।। प्रतिदिन पूजें भाव से चढ़ा भक्ति के फूल। नहीं जन्म भर हम सके जन्मभूमि को भूल।। पग सेवा है जननि की जनजीवन का सार। मिले राजपद भी रहे जन्मभूमि रज प्यार।।
कविता संग्रह
हाथों में तिरंगा हो – कुमार विश्वास
दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो
कर चले हम फ़िदा – कैफ़ि आज़मी
कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियो अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो साँस थमती गई, नब्ज़ जमती गई फिर भी बढ़ते क़दम को न रुकने दिया कट गए सर हमारे तो कुछ ग़म नहीं सर हिमालय का हमने न झुकने दिया
भारत मां की जय बोलो – हरिवंशराय बच्चन
एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो। इन जंजीरों की चर्चा में कितनों ने निज हाथ बँधाए, कितनों ने इनको छूने के कारण कारागार बसाए, इन्हें पकड़ने में कितनों ने लाठी खाई, कोड़े ओड़े, और इन्हें झटके देने में कितनों ने निज प्राण गँवाए! किंतु शहीदों की आहों से शापित लोहा, कच्चा धागा। एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो।
बुझ गया दिल – ख़ुमार बाराबंकवी
बुझ गया दिल हयात बाक़ी है छुप गया चाँद रात बाक़ी है हाले-दिल उन से कह चुके सौ बार अब भी कहने की बात बाक़ी है
चंदा मामा, आ जाना – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
चंदा मामा, आ जाना, साथ मुझे कल ले जाना। कल से मेरी छुट्टी है ना आये तो कुट्टी है। चंदा मामा खाते लड्डू, आसमान की थाली में। लेकिन वे पीते हैं पानी आकर मेरी प्याली में।
हिज्र की शब है और उजाला है – ख़ुमार बाराबंकवी
हिज्र की शब है और उजाला है क्या तसव्वुर भी लुटने वाला है ग़म तो है ऐन ज़िन्दगी लेकिन ग़मगुसारों ने मार डाला है इश्क़ मज़बूर-ओ-नामुराद सही फिर भी ज़ालिम का बोल-बाला है
कौन सिखाता है – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
कौन सिखाता है चिड़ियों को चीं-चीं, चीं-चीं करना? कौन सिखाता फुदक-फुदक कर उनको चलना फिरना? कौन सिखाता फुर्र से उड़ना दाने चुग-चुग खाना? कौन सिखाता तिनके ला-ला कर घोंसले बनाना? कौन सिखाता है बच्चों का लालन-पालन उनको? माँ का प्यार, दुलार, चौकसी कौन सिखाता उनको?
हुस्न जब मेहरबाँ हो तो क्या कीजिए – ख़ुमार बाराबंकवी
हुस्न जब मेहरबाँ हो तो क्या कीजिए इश्क़ की मग़फ़िरत की दुआ कीजिए इस सलीक़े से उनसे गिला कीजिए जब गिला कीजिए, हँस दिया कीजिए
मूल मंत्र – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
केवल मन के चाहे से ही मनचाही होती नहीं किसी की। बिना चले कब कहाँ हुई है मंज़िल पूरी यहाँ किसी की।। पर्वत की चोटी छूने को पर्वत पर चढ़ना पड़ता है। सागर से मोती लाने को गोता खाना ही पड़ता है।।






