आग न जलने देना – रमानाथ अवस्थी

जो आग जला दे भारत की ऊँचाई, वह आग न जलने देना मेरे भाई । तू पूरब का हो या पश्चिम का वासी तेरे दिल में हो काबा या हो काशी तू संसारी हो चाहे हो संन्यासी तू चाहे कुछ भी हो पर भूल नहीं तू सब कुछ पीछे पहले भारतवासी ।

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जिसे नहीं कुछ चाहिए – रमानाथ अवस्थी

जिसे नहीं कुछ चाहिए, वही बड़ा धनवान । लेकिन धन से भी बड़ा, दुनिया में इन्सान । चारों तरफ़ मची यहाँ भारी रेलमपेल । चोर उचक्के ख़ुश बहुत, सज्जन काटें जेल । मतलब की सब दोस्ती देख लिया सौ बार । काम बनाकर हो गया, जिगरी दोस्त फ़रार ।

वह एक दर्पण चाहिए – रमानाथ अवस्थी

हर दर्द झूठा लग रहा सह कर मजा आता नहीं आँसू वही आँखें वही कुछ है ग़लत कुछ है सही जिसमें नया कुछ दिख सके वह एक दर्पण चाहिए राहें पुरानी पड़ गईं आख़िर मुसाफ़िर क्या करे! सम्भोग से संन्यास तक आवास से आकाश तक भटके हुए इनसान को कुछ और जीवन चाहिए!

जाना है दूर – रमानाथ अवस्थी

रोको मत जाने दो जाना है दूर वैसे तो जाने को मन ही होता नहीं, लेकिन है कौन यहाँ जो कुछ खोता नहीं  तुमसे मिलने का मन तो है मैं क्या करूँ? बोलो तुम कैसे कब तक मैं धीरज धरूँ । मुझसे मत पूछो मैं कितना मज़बूर । रोको मत जाने दो जाना है दूर

रात की बात – रमानाथ अवस्थी

रात की बात, रात को होगी  दिन भर की आपाधापी से  मन का दर्पण धुँधलाया है । जिसने जितना दिया यहाँ पर  उसने उतना ही पाया है । सबकुछ पा लेने की धुन में  सबके सब दिखते हैं रोगी । 

मन – रमानाथ अवस्थी

मन को वश में करो फिर चाहे जो करो । कर्ता तो और है रहता हर ठौर है वह सबके साथ है दूर नहीं पास है तुम उसका ध्यान धरो । फिर चाहे जो करो । सोच मत बीते को हार मत जीते को गगन कब झुकता है समय कब रुकता है समय से मत लड़ो । फिर चाहे जो करो । रात वाला सपना सवेरे कब अपना रोज़ यह होता है व्यर्थ क्यों रोता है डर के मत मरो । फिर चाहे जो करो ।

चुप रहिए – रमानाथ अवस्थी

देख रहे हैं जो भी, किसी से मत कहिए, मौसम ठीक नहीं है, आजकल चुप रहिए। कल कुछ देर किसी सूने में, मैंने कीं ख़ुद से कुछ बातें, लगा कि जैसे मुझे बुलाएँ बिन बाजों वाली बारातें। कोई नहीं मिला जो सुनता मुझसे मेरी हैरानी को, देखा सबने मुझे न देखा, मेरी आँखों के पानी को।

चंदन – रमानाथ अवस्थी

चंदन है तो महकेगा ही आग में हो या आँचल में छिप न सकेगा रंग प्यार का चाहे लाख छिपाओ तुम कहने वाले सब कह देंगे कितना ही भरमाओ तुम घुंघरू है तो बोलेगा ही सेज में हो या साँकल में

कभी कभी – रमानाथ अवस्थी

कभी कभी जब मेरी तबियत यों ही घबराने लगती है तभी ज़िन्दगी मुझे न जाने क्या-क्या समझाने लगती है रात, रात भर को ही मिलती दिन भी मिलता दिन भर को कोई पूरी तरह न मिलता रमानाथ लौटो घर को

इन्सान – रमानाथ अवस्थी

मैंने तोड़ा फूल, किसी ने कहा- फूल की तरह जियो औ मरो सदा इंसान । भूलकर वसुधा का शृंगार, सेज पर सोया जब संसार, दीप कुछ कहे बिना ही जला- रातभर तम पी-पीकर पला- दीप को देख, भर गए नयन उसी क्षण- बुझा दिया जब दीप, किसी ने कहा दीप की तरह जलो, तम हरो सदा इंसान ।