पर्वत पर, शायद, वृक्ष न कोई शेष बचा,
धरती पर, शायद, शेष बची है नहीं घास;
उड़ गया भाप बनकर सरिताओं का पानी,
बाकी न सितारे बचे चाँद के आस-पास ।
क्या कहा कि मैं घनघोर निराशावादी हूँ?
तब तुम्हीं टटोलो हृदय देश का, और कहो,
लोगों के दिल में कहीं अश्रु क्या बाकी है?
बोलो, बोलो, विस्मय में यों मत मौन रहो ।
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी द्वारा अन्य रचनाएँ
-
कृष्ण की चेतावनी
-
परम्परा
-
समर शेष है
-
परिचय
-
दिल्ली
-
झील
-
वातायन
-
समुद्र का पानी
-
ध्वज-वंदना
-
आग की भीख
-
बालिका से वधू
-
जियो जियो अय हिन्दुस्तान
-
कुंजी
-
परदेशी
-
एक पत्र
-
एक विलुप्त कविता
-
आशा का दीपक
-
कलम, आज उनकी जय बोल
-
शक्ति और क्षमा
-
हो कहाँ अग्निधर्मा नवीन ऋषियों
-
गीत-अगीत
-
गाँधी
-
लेन-देन
-
निराशावादी
-
रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद
-
लोहे के मर्द
-
विजयी के सदृश जियो रे
-
पढ़क्कू की सूझ
-
वीर
-
मनुष्यता
-
पर्वतारोही
-
करघा
-
चांद एक दिन
-
भारत
-
भगवान के डाकिए
-
जब आग लगे
-
लोहे के पेड़ हरे होंगे
-
शोक की संतान
-
जनतन्त्र का जन्म
-
राजा वसन्त वर्षा ऋतुओं की रानी
-
मेरे नगपति! मेरे विशाल!
-
सिपाही
-
रोटी और स्वाधीनता
-
अवकाश वाली सभ्यता
-
व्याल-विजय
-
माध्यम
-
कलम या कि तलवार
-
हमारे कृषक

