करघा – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

हर ज़िन्दगी कहीं न कहीं दूसरी ज़िन्दगी से टकराती है। हर ज़िन्दगी किसी न किसी ज़िन्दगी से मिल कर एक हो जाती है । ज़िन्दगी ज़िन्दगी से इतनी जगहों पर मिलती है कि हम कुछ समझ नहीं पाते और कह बैठते हैं यह भारी झमेला है। संसार संसार नहीं, बेवकूफ़ियों का मेला है।

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पर्वतारोही – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

मैं पर्वतारोही हूँ। शिखर अभी दूर है। और मेरी साँस फूलनें लगी है। मुड़ कर देखता हूँ कि मैनें जो निशान बनाये थे, वे हैं या नहीं। मैंने जो बीज गिराये थे, उनका क्या हुआ?

मनुष्यता – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

है बहुत बरसी धरित्री पर अमृत की धार; पर नहीं अब तक सुशीतल हो सका संसार| भोग लिप्सा आज भी लहरा रही उद्दाम; बह रही असहाय नर कि भावना निष्काम| लक्ष्य क्या? उद्देश्य क्या? क्या अर्थ?

वीर – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

सच है, विपत्ति जब आती है,  कायर को ही दहलाती है,  सूरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते, विघ्नों को गले लगाते हैं, काँटों में राह बनाते हैं। 

पढ़क्‍कू की सूझ – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

एक पढ़क्‍कू बड़े तेज थे, तर्कशास्‍त्र पढ़ते थे, जहाँ न कोई बात, वहाँ भी नए बात गढ़ते थे। एक रोज़ वे पड़े फिक्र में समझ नहीं कुछ न पाए, "बैल घुमता है कोल्‍हू में कैसे बिना चलाए?"

विजयी के सदृश जियो रे – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

वैराग्य छोड़ बाँहों की विभा संभालो  चट्टानों की छाती से दूध निकालो  है रुकी जहाँ भी धार शिलाएं तोड़ो  पीयूष चन्द्रमाओं का पकड़ निचोड़ो  चढ़ तुंग शैल शिखरों पर सोम पियो रे  योगियों नहीं विजयी के सदृश जियो रे! 

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,  आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!  उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,  और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।  जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?  मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते;  और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी  चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते। 

लोहे के मर्द – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

पुरुष वीर बलवान, देश की शान, हमारे नौजवान घायल होकर आये हैं। कहते हैं, ये पुष्प, दीप, अक्षत क्यों लाये हो?

निराशावादी – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

पर्वत पर, शायद, वृक्ष न कोई शेष बचा, धरती पर, शायद, शेष बची है नहीं घास; उड़ गया भाप बनकर सरिताओं का पानी, बाकी न सितारे बचे चाँद के आस-पास ।

लेन-देन – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

लेन-देन का हिसाब लंबा और पुराना है। जिनका कर्ज हमने खाया था, उनका बाकी हम चुकाने आये हैं। और जिन्होंने हमारा कर्ज खाया था, उनसे हम अपना हक पाने आये हैं।