मेरा देश – विकास-कुमार

यह अमर कथा है भारत की
सृष्टी के श्रेष्ठ विचारक की
विश्व गुरु का ज्ञान जहां है
स्वर्ण चिड़िया का बखान यहां है
कल कल गंगा यहां बहती है
चल चल कर यह कुछ कहती है
मस्तक पर गिरिराज विराजे
सिंधु स्वम पाँव पखारे
उर पर बहती सरिता सुंदर
हरे भरे सघन वन तरुवर
नदियाँ ,मौसम, पर्वत, झींगुर
हवा , झील, बारिश और समंदर
चांदनी रातें जुगनू तारा
सब एक से एक लगे है न्यारा
शीतल मधुर पवन के झोंके
सरसों के खेत, पीत फूल अनोखे
चिर काल सभ्यता के फूल खिले हैं
कुछ आगे बढ़े सत्पुरुष मिले हैं
बोधायन, चरक, सुश्रुत, जीवक
आर्यभट, ब्रह्मगुप्त, वाग्भट
नागार्जुन भास्कर ,रवि सम चमके
भारत के वीर हर छड़ दमके
चन्द्रगुप्त सम्राट हुए हैं
देश हित सब काज किये हैं
पर समय का पहिया चलता रहता
मनुज गिरता और फिर सम्भलता
समय बलवान आगे बढ़ जाता
विकराल रूप धर कुछ कह जाता
क्षारण सभ्यताओं का होता है
मनुज मनुज से फिर कटता है
गीत निज स्वार्थ के लिखता है
जाति धर्म में फिर बंटता है
देश धर्म से कट जाता है
शत्रू बलवति फिर हो जाता है
देश कुमार्ग पर  बढ़ने लगता
निज स्वार्थ बड़ा इस भृम में पलता
जात पाँत फिर बड़ा हो जाता
देश दासता की वेदि चढ़ जाता
बलवान नहीं यहां युद्ध लड़े थे
खानों में बैठे श्रेष्ठ देश विरुद्ध खड़े थे
एकता नहीं यहां मनुज के भीतर
श्रेष्ठता के ढूढ़ते मनुज यहां अवसर
शत्रू बलवती होता जाता
दासता की जंजीरों में देश जकड़ता जाता
मुगल गोरे आतातायी भारी
जाति धर्म पड़ गए थे भारी
स्वर्ण चिड़िया के पंख उखाड़े
सवर्ण दलित देखते रहे बेचारे
फिर भी जाति का मोह न टूटा
मनुज से श्रेष्ठता का दम्भ न छूटा
देश रण भूमि में पड़ा कराहता
श्रेष्ठ यहां दासता की राह बनाता
पानी धरा पर अधिकार बांटता
गले में घट,कमर में झाड़ू बांधता
अपनों ने शत्रु सम हैवानियत धारा
नीच नीच कह आत्मा का बदन उघाड़ा
मन्दिर में नहीं घुसेंगे नीच बेचारे
भले ही प्राण देश के लेंवें बिन विचारे
वही हुआ जिस बात का डर था
शत्रु घर में ,निज भाई बेघर था।
हाय बन गए मुग़ल देश के विधाता
प्रताड़ित जन जन यहां यह भेद निराला
अंग्रेज हुए थे हम पर हावी
जाति  धर्म पड़ गए थे भारी
एक एक खाना लूटते जाते
हम विभक्त मन मन हर्षाते
भारत देश कहते हम किसको
खानों खानों में बाँट रहे थे खुद को
विश्व गुरु हम बन न सके थे
प्रकृति से सीख कुछ ले न सके थे
हम मनुज मनुज के हो न सके थे
गीता का कर्म था जन्म पर हावी
मुंह में राम , बगल में ईंट थी भारी
नदी न नीर को बांट सकी है
श्रेष्ठजनों की ये कैसी मति है
सूरज न कभी प्रकाश छुपाता
मनुज नीच राग द्वेष बनाता
हवा बहती निरन्तर अविराम
चलती हर दिशा शहर और गाम
प्रकति न कभी यह भेद मानती
नीच श्रेष्ठ के ना उसूल जानती
फिर कौन श्रेष्ठ यहाँ , कौन नीच है
प्रकृति से बड़ी ये किसकी सीख है
देश हित तज, निज स्वार्थ बांधते
दुष्ट यहां अपनों को बाँटते
कुछ समझ गए, फिर सम्भल गए
देश हित संग्राम में उतर गए।
फिर देश ही जाति बना
देश ही फिर धर्म था
देश हित लड़ने वाला
देश का ही लाल था
भगत सिंह , चन्द्रशेखर हुए
तो वीरांगना झलकारी बाई थी
बिरसा, अगरजीत  वीर थे
तो उधम सिंह से शेर थे
सुभाष, बिस्मिल लड़ गए
अंग्रेज खुद से डर गए
आजाद भारत हो गया था
मानो की तूफान थम गया था
अमरत्व का सन्धान हुआ था
एक नया भारत रचने चले थे
पर विजय के पल अधूरे हुए थे
रास्ते में कांटे अभी भी थे भारी
दुष्चक्र अपने ही  रचते थे भारी
मनुज को फिर से बांटने चले व्यभिचारी
मनुज ही मनुज का फिर दुश्मन बना था
भाई से भाई फिर लड़ कट मरा था
हिन्द पाक में विखंडित फिर हुए थे
निज श्रेष्ठता के हित देशद्रोही हुए थे
जाति दम्भ के बीज फिर उपजे
देश छोड़ राजा बहुत से फिर पनपे
लौह पुरुष एक ऐसा फिर आया
भारत देश अखण्ड फिर से कराया
आजाद होकर भी आजाद नहीं थे
सभ्यता , समरसता के अंकुरण नहीं थे
नीच ऊँच में बंटे थे जनमानस
असभ्य जंगली थे जैसे वनमानुष
फिर महामानव ऐसा बीच आया
सभयता सम्सरता जिसने सिखाया
सँविधान में प्रताडितो को हक़ दिलवाया
इंसान को इंसान होना सिखाया
जो थे असभ्य उनको सभ्य बनाया
महापुरुष हुए थे वीर बड़े ज्ञानी
पर जाति पर कभी न बोले हितकारी
उसने सीख ऐसी हमको दे डाली
मानव को मानव की राह दिखा डाली
वेद पुराण जिसे कह न सके थे
सविंधान ने  प्रसस्त मार्ग ऐसे किये थे
पर लालच की बयार ने नेता को लपेटा
देश से विमुख  जाति को समेटा
भाईओं में फिर से वो फूट डालते
वोटों की खातिर सवर्ण दलित में बांटते
आजादी से विमुख मार्ग गुलामी के बनाते
निज स्वार्थ में अपनों का खून बहाते
हाय ये कैसी मिली आजादी
देश त्राही त्राही और नेता करते मनमानी
आजादी का ये कैसा मिलता मुकाम है
धनी और धनी गरीब के ना सर पर छान है
आलू अमीर जा बैठा A.C में
किसान तपता भारी दोपहरी में
दाल उगाता किसान है करता दिन रैन उम्मीद
अमीरों के हाथ में आकर हो गई सोने की ईंट
कृषि प्रधान देश मेरा है
गाँव बेहाल शहर चौड़ा है
रोज  दिवाली श हर में होती
गाँव बिना बिजली और रोटी
गाँव के कानून बड़े निराले
जातियों के सहारे बंटे निवाले
सूदखोर बैठे खाते रहते
दीन हीन उनको ही कमाते
इंसान पशु में भेद ना होता
कुछ का बिस्तर जमीन पर होता
ये रीत बड़ी मिटती ही नहीं है
गरीब की खाई पटती ही नहीं है
70 साल आजादी के पाए
दलित अभी तक ना इंसान बन पाए
जाती वाद कर चुप हो जाते
आरक्षण पर हल्ला खूब मचाते
दलित भी एकता की ना मिसाल बनाते
अपनों के बीच ही कुचक्र रचाते
जाति रहे ना रहे यह सच है
आरक्षण के बीज भी ना कुछ कम हैं
तुम नॉकरी पाकर पेट पालते
पिछडों का न कभी  हित सँवारते
शादी ब्याह में लग गए लाखों
समाज सेवा में हाथ खाली दोनो
ना स्कूल ना अस्पताल है पास मेँ
मन्दिर के लिए पैसा है साथ में
एकता के सूत्र में खुद जो बंधोगे
खुद के सहारे खुद ही बनोगे
परस्पर सदभाव प्रगति के मार्ग खोलता
दलित हो या सवर्ण स्वयं ही बदलता
गुरू अभिभावक दो रूप भारी
समस्यऐं खत्म कर सकते सारी
देश स्वयं ही प्रगति करेगा
अभिभावक गुरू जो सदाचारी बनेगा
कबीर बौद्ध को अनुगामी बना लो
प्रथाओं की किताबों को आग में जला दो
दुश्मन होता नहीं यहां कोई
इस पल यहाँ तो उस पल कोई
यह सांसो का खेल है चलता ही रहता
जिंदगी की डोर में मनुज सिमटता ही रहता
तुम कौन हो किससे बैर रचाते
ब्रह्मांड के अमरत्व को न समझ पाते
फिर भी यदि तुम मूर्ख नहीं हो
खुद से विलग पर देश से नहीं हो
देश हित जैसा न कोई हित होता
देश परतंत्र तो न कोई उच्च होता
तुम झेलकर भी अनविज्ञ भारी
कल जो थी मूर्खता आज भी जारी
क्या है ब्राह्मण क्या ये क्षत्रिय है
क्या है वैश्य क्या ये शूद्र है
अरे मूर्ख ये देश तोड़ने के जाल हैं
स्वम के हित साधने मात्र हैं
तुम न इस खेल को मानो
देश हित तुम  सर्वश्व वारो
फिर ये देश स्वर्ण चिड़िया बनेगा
अगर देश का हित ऊंचा रहेगा
जाति न होगी ना आरक्षण होगा
हर झोपड़ी में उजाला जो होगा
भूखा रहेगा न यहां यदि कोई
तभी तो उच्च होगा हर कोई
हर साँस में स्फूर्ति सी होगी
यदि जाति की ना यहाँ बू होगी
आरक्षण की ना कभी जरूरत है
यदि विधा का दान सर्व जन को है
मन्दिर की पूजा, मस्जिद की इबादत
इंसानों के दिल की ही है जरूरत
हिन्दू मुस्लिम सब एक हो जाएं
यदि धर्म देश से छोटे हो जाएं
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कवि – विकास कुमार

यह कविता हमारे कवि मंडली के नवकवि विकास कुमार जी की है । वह वित्त मंत्रालय नार्थ ब्लाक दिल्ली में सहायक अनुभाग अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं । उनकी दैनिंदिनी में कभी कभी  उन्हें लिखने का भी समय मिल जाता है । वैसे तो उनका लेखन किसी वस्तु विशेष के बारे में नहीं रहता मगर न चाहते हुए भी आप उनके लेखन में उनके स्वयं के जीवन अनुभव को महसूस कर सकते हैं । हम आशा करते हैं की आपको उनकी ये कविता पसंद आएगी ।

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