मेरी रचना के अर्थ बहुत से हैं जो भी तुमसे लग जाए लगा लेना । मैं गीत लुटाता हूँ उन लोगों पर दुनिया में जिनका कोई आधार नहीं मैं आँख मिलाता हूँ उन आँखों से जिनका कोई भी पहरेदार नहीं । आँखों की भाषाएँ तो अनगिन हैं जो भी सुंदर हो समझा देना
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हमारे वेद – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
अभी नर जनम की बजी भी बधाई। रही आँख सुधा बुधा अभी खोल पाई। समझ बूझ थी जिन दिनों हाथ आई। रही जब उपज की झलक ही दिखाई। कहीं की अंधेरी न थी जब कि टूटी। न थी ज्ञान सूरज किरण जब कि फूटी।1। तभी एक न्यारी कला रंग लाई। हमारे बड़ों के उरों में समाई। दिखा पंथ पारस बनी काम आई। फबी और फूली फली जगमगाई। उसी से हुआ सब जगत में उँजाला। गया मूल सारे मतों का निकाला।2
हम-तुम – रमानाथ अवस्थी
जीवन कभी सूना न हो कुछ मैं कहूँ, कुछ तुम कहो। तुमने मुझे अपना लिया यह तो बड़ा अच्छा किया जिस सत्य से मैं दूर था वह पास तुमने ला दिया अब ज़िन्दगी की धार में कुछ मैं बहूँ, कुछ तुम बहो
माता-पिता – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
उसके ऐसा है नहीं अपनापन में आन। पिता आपही अवनि में हैं अपना उपमान।1। मिले न खोजे भी कहीं खोजा सकल जहान। माता सी ममतामयी पाता पिता समान।2। जो न पालता पिता क्यों पलना सकता पाल। माता के लालन बिना लाल न बनते लाल।3।
सौ बातों की एक बात है – रमानाथ अवस्थी
सौ बातों की एक बात है । रोज़ सवेरे रवि आता है दुनिया को दिन दे जाता है लेकिन जब तम इसे निगलता होती जग में किसे विकलता सुख के साथी तो अनगिन हैं लेकिन दुःख के बहुत कठिन हैं सौ बातो की एक बात है |
गुणगान – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
गणपति गौरी-पति गिरा गोपति गुरु गोविन्द। गुण गावो वन्दन करो पावन पद अरविन्द।1। देव भाव मन में भरे दल अदेव अहमेव। गिरि गुरुता से हैं अधिक गौरव में गुरुदेव।2। पाप-पुंज को पीस गुरु त्रिविध ताप कर दूर। हैं भरते उर-भवन में भक्ति-भाव भरपूर।3।
ऐसी तो कोई बात नहीं – रमानाथ अवस्थी
तुमसे भी छिपा सकूँ जो मै ऐसी तो कोई बात नहीं जीवन में | मन दिया तुम्हें मैंने ही अपने मन से रंग दिया तुम्हें मैंने अपने जीवन से बीते सपनो में आए बिना तुम्हारे ऐसी तो कोई रात नहीं जीवन में
आदर्श – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
लोक को रुलाता जो था राम ने रुलाया उसे हम खल खलता के खले हैं कलपते। काँपता भुवन का कँपाने वाला उन्हें देख हम हैं बिलोक बल-वाले को बिलपते। हरिऔधा वे थे ताप-दाता ताप-दायकों के हम नित नये ताप से हैं आप तपते। रोम रोम में जो राम-काम रमता है नहीं नाम के लिए तो राम नाम क्या हैं जपते।1।
बुलावा – रमानाथ अवस्थी
प्यार से मुझको बुलाओगे जहाँ एक क्या सौ बार आऊँगा वहाँ पूछने की है नहीं फ़ुर्सत मुझे कौन हो तुम क्या तुम्हारा नाम है किस लिए मुझको बुलाते हो कहाँ कौन सा मुझसे तुम्हारा काम है
कमनीय कामनाएँ – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
वर-विवेक कर दान सकल-अविवेक निवारे। दूर करे अविनार सुचारु विचार प्रचारे। सहज-सुतति को बितर कुमति-कालिमा नसावे। करे कुरुचि को विफल सुरुचि को सफल बनावे। भावुक-मन-सुभवन में रहे प्रतिभा-प्रभा पसारती। भव-अनुपम-भावों से भरित भारत-भूतल-भारती।1।


