उस समय भी – रमानाथ अवस्थी

जब हमारे साथी-संगी हमसे छूट जाएँ जब हमारे हौसलों को दर्द लूट जाएँ जब हमारे आँसुओं के मेघ टूट जाएँ उस समय भी रुकना नहीं, चलना चाहिए, टूटे पंख से नदी की धार ने कहा ।

प्रार्थना – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

हे दीनबंधु दया-निकेतन विहग-केतन श्रीपते। सब शोक-शमन त्रिताप-मोचन दुख-दमन जगतीपते। भव-भीति-भंजन दुरित-गंजन अवनि-जन-रंजन विभो। बहु-बार जन-हित-अवतरित ऐ अति-उदार-चरित प्रभो

सारी रात – रमानाथ अवस्थी

धीरे-धीरे बात करो सारी रात प्यार से । भोर होते चाँद के ही साथ-साथ जाऊँगा हो सका तो शाम को सितारों के संग आऊँगा धीरे-धीरे ताप हरो प्यार के अंगार से | तन का सिंगार तो हज़ार बार होता है किंतु प्यार जीवन में एक बार होता है धीरे-धीरे बूँद चुनो ज़िन्दगी की धार से ।

अभेद का भेद – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

खोजे खोजी को मिला क्या हिन्दू क्या जैन। पत्ता पत्ता क्यों हमें पता बताता है न।1। रँगे रंग में जब रहे सकें रंग क्यों भूल। देख उसी की ही फबन फूल रहे हैं फूल।2। क्या उसकी है सोहती नहीं नयन में सोत। क्या जग में है जग रही नहीं जागती जोत।3।

वे दिन – रमानाथ अवस्थी

याद आते हैं फिर बहुत वे दिन               जो बड़ी मुश्किलों से बीते थे ! शाम अक्सर ही ठहर जाती थी देर तक साथ गुनगुनाती थी ! हम बहुत ख़ुश थे, ख़ुशी के बिन भी चाँदनी रात भर जगाती थी !               हमको मालूम है कि हम कैसे               आग को ओस जैसे पीते थे !

करूँ क्या ? – रमानाथ अवस्थी

सुर सब बेसुरे हुए करूँ क्या ?              उतरे हुए सभी के मुखड़े              सबके पाँव लक्ष्य से उखड़े उखड़ी हुई भ्रष्ट पीढ़ी से विजय-वरण के लिए कहूँ क्या ?              सागर निकले ताल सरीखे              अन्धों को कब आँसू दीखे

निर्मम संसार – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

वायु के मिस भर भरकर आह । ओस मिस बहा नयन जलधार । इधर रोती रहती है रात । छिन गये मणि मुक्ता का हार ।।१।।

मतवाली ममता – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

मानव ममता है मतवाली । अपने ही कर में रखती है सब तालों की ताली । अपनी ही रंगत में रंगकर रखती है मुँह लाली । ऐसे ढंग कहा वह जैसे ढंगों में हैं ढाली । धीरे-धीरे उसने सब लोगों पर आँखें डाली । अपनी-सी सुन्दरता उसने कहीं न देखी-भाली ।

फूल – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

रंग कब बिगड़ सका उनका रंग लाते दिखलाते हैं । मस्त हैं सदा बने रहते । उन्हें मुसुकाते पाते हैं ।।१।। भले ही जियें एक ही दिन । पर कहा वे घबराते हैं । फूल हँसते ही रहते हैं । खिला सब उनको पाते हैं ।।२।।

विवशता – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

रहा है दिल मला करे । न होगा आँसू आए । सब दिनों कौन रहा जीता । सभी तो मरते दिखलाए ।।१।। हो रहेगा जो होना है टलेगी घड़ी न घबराए। छूट जाएँगे बंधन से। मौत आती है तो आए।।२।।