तुम्हारी चाँदनी का क्या करूँ मैं अँधेरे का सफ़र मेरे लिए है किसी गुमनाम के दुख-सा अजाना है सफ़र मेरा पहाड़ी शाम-सा तुमने मुझे वीरान में घेरा तुम्हारी सेज को ही क्यों सजाऊँ समूचा ही शहर मेरे लिए है
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लाचारी – रमानाथ अवस्थी
न जाने क्या लाचारी है आज मन भारी-भारी है हृदय से कहता हूँ कुछ गा प्राण की पीड़ित बीन बजा प्यास की बात न मुँह पर ला यहाँ तो सागर खारी है न जाने क्या लाचारी है आज मन भारी-भारी है
परिवर्तन – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
तिमिर तिरोहित हुए तिमिर-हर है दिखलाता। गत विभावरी हुए विभा बासर है पाता। टले मलिनता सकल दिशा है अमलिन होती। भगे तमीचर, नीरवता तमचुर-धवनि खोती। है वहाँ रुचिरता थीं जहाँ धाराएँ अरुचिर बहीं। कब परिवर्तन-मय जगत में परिवर्तन होता नहीं।1।
जीवन-मरण – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
पोर पोर में है भरी तोर मोर की ही बान मुँह चोर बने आन बान छोड़ बैठी है। कैसे भला बार बार मुँह की न खाते रहें सारी मरदानगी ही मुँह मोड़ बैठी है। हरिऔधा कोई कस कमर सताता क्यों न कायरता होड़ कर नाता जोड़ बैठी है। छूट चलती है आँख दोनों ही गयी है फूट हिन्दुओं में फूट आज पाँव तोड़ बैठी है।1।
मेरे पंख कट गये – रमानाथ अवस्थी
मेरे पंख कट गये हैं वरना मैं गगन को गाता। कोई मुझे सुनाओ फिर से वही कहानी, कैसे हुई थी मीरा घनश्याम की दीवानी। मीरा के गीत को भी कोई विष रहा सताता।
विद्यालय – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
है विद्यालय वही जो परम मंगलमय हो। बरविचार आकलित अलौकिक कीर्ति निलय हो। भावुकता बर वदन सुविकसित जिससे होवे। जिसकी शुचिता प्रीति वेलि प्रति उर में बोवे। पर अतुलित बल जिससे बने जाति बुध्दि अति बलवती। बहु लोकोत्तर फल लाभ कर हो भारत भुवि फलवती।1।
मैं सदा बरसने वाला मेघ बनूँ – रमानाथ अवस्थी
मैं सदा बरसने वाला मेघ बनूँ तुम कभी न बुझने वाली प्यास बनो । संभव है बिना बुलाए तुम तक आऊँ हो सकता है कुछ कहे बिना फिर जाऊँ यों तो मैं सबको बहला ही लेता हूँ लेकिन अपना परिचय कम ही देता हूँ । मैं बनूँ तुम्हारे मन की सुन्दरता तुम कभी न थकने वाली साँस बनो।
उद्बोधन – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
वेदों की है न वह महिमा धर्म ध्वंस होता। आचारों का निपतन हुआ लुप्त जातीयता है। विप्रो खोलो नयन अब है आर्यता भी विपन्ना। शीलों की है मलिन प्रभुता सभ्यता वंचिता है।1। सच्चे भावों सहित जिन के राम ने पाँव पूजे। पाई धोके चरण जिन के कृष्ण ने अग्र पूजा। होते वांछा विवश इतने आज वे विप्र क्यों हैं। जिज्ञासू हो निकट जिन के बुध्द ने सिध्दि पाई।2।
मन चाहिए – रमानाथ अवस्थी
कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए ! थककर बैठो नहीं प्रतीक्षा कर रहा कोई कहीं हारे नहीं जब हौसले तब कम हुये सब फासले दूरी कहीं कोई नहीं केवल समर्पण चाहिए
पुष्पांजलि – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
राम चरित सरसिज मधुप पावन चरित नितान्त। जय तुलसी कवि कुल तिलक कविता कामिनि कान्त।1। सुरसरि धारा सी सरस पूत परम रमणीय। है तुलसी की कल्पना कल्पलता कमनीय।2।


