कविता संग्रह

झुंझलाए है लजाए है  – ख़ुमार बाराबंकवी

झुंझलाए है लजाए है फिर मुस्कुराए है इसके दिमाग से उन्हे हम याद आए है अब जाके आह करने के आदाब आए है दुनिया समझ रही है कि हम मुस्कुराए है

न हारा है इश्क और न दुनिया थकी है  – ख़ुमार बाराबंकवी

न हारा है इश्क और न दुनिया थकी है  दिया जल रहा है हवा चल रही है सुकू ही सुकू है खुशी ही खुशी है तेरा गम सलामत मुझे क्या कमी है वो मौज़ूद है और उनकी कमी है  मुहब्बत भी तहाई-ए-दायमी है

तेरे दर से उठकर जिधर जाऊं मैं  – ख़ुमार बाराबंकवी

वो जो आए हयात याद आई भूली बिसरी सी बात याद आई कि हाल-ए-दिल उनसे कहके जब लौटे उनसे कहने की बात याद आई

आओ प्यारे तारो आओ – महादेवी वर्मा

आओ, प्यारे तारो आओ तुम्हें झुलाऊँगी झूले में, तुम्हें सुलाऊँगी फूलों में, तुम जुगनू से उड़कर आओ, मेरे आँगन को चमकाओ।

चंचल पग दीप-शिखा- सुमित्रानंदन पंत

चंचल पग दीप-शिखा-से धर गृह,मग, वन में आया वसन्त! सुलगा फाल्गुन का सूनापन सौन्दर्य-शिखाओं में अनन्त! सौरभ की शीतल ज्वाला से फैला उर-उर में मधुर दाह आया वसन्त, भर पृथ्वी पर स्वर्गिक सुन्दरता का प्रवाह!

संध्‍या के बाद – सुमित्रानंदन पंत

सिमटा पंख साँझ की लाली जा बैठी तरू अब शिखरों पर ताम्रपर्ण पीपल से, शतमुख झरते चंचल स्‍वर्णिम निझर! ज्‍योति स्‍थंभ-सा धँस सरिता में सूर्य क्षितीज पर होता ओझल बृहद जिह्म ओझल केंचुल-सा लगता चितकबरा गंगाजल! धूपछाँह के रंग की रेती अनिल ऊर्मियों से सर्पांकित नील लहरियों में लोरित

सुना है वो हमें भुलाने लगे है  – ख़ुमार बाराबंकवी

सुना है वो हमें भुलाने लगे है तो क्या हम उन्हे याद आने लगे है हटाए थे जो राह से दोस्तो की तो पत्थर मेरे घर में आने लगे है

आइना टाल देता है – विकाश कुमार

रोज़ पूछता हूँ कौन है... रोज़ आइना टाल देता है इस साल कुछ बदलेंगे... दिल क़रार हर साल देता है

वो जो आए हयात याद आई  – ख़ुमार बाराबंकवी

वो जो आए हयात याद आई भूली बिसरी सी बात याद आई कि हाल-ए-दिल उनसे कहके जब लौटे उनसे कहने की बात याद आई

वो हमें जिस कदर आज़माते रहे  – ख़ुमार बाराबंकवी

वो हमें जिस कदर आज़माते रहे अपनी ही मुश्किलो को बढ़ाते रहे  थी कमाने तो हाथो में अब यार के तीर अपनो की जानिब से आते रहे