मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं – विकाश कुमार

चादरों पर अब सलवटें नहीं पड़ती कपड़े भी इधर उधर बिखरें नहीं ना नयी फ़रमाहिशे हैं हर दिन रोज़ अब यही कहानी है बच्चों के बिन क्यूँकि मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं

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साँझ हुई परदेस में – विकाश कुमार

साँझ हुई परदेस में दिल देश में डूब गया अब इस भागदौड़ से जी अपना ऊब गया वरदान मिलने की चाह नहीं मेहनत का फ़ल ही मिल जाता किसको को क्या मिला यहाँ हिसाब में वक़्त ख़ूब गया

चलते हैं घड़ी के काँटे – विकाश कुमार

चलते हैं घड़ी के काँटे और काँटों पे चलते हम हर दिन जलने के बाद सूरज से ढलते हम

मेरे घर भी दिवाली है – विकाश कुमार

बना कर दिए मिट्टी के ज़रा सी आस पाली है , ख़रीद लो मेहनत मेरी , मेरे घर भी दिवाली है

आइना टाल देता है – विकाश कुमार

रोज़ पूछता हूँ कौन है... रोज़ आइना टाल देता है इस साल कुछ बदलेंगे... दिल क़रार हर साल देता है

हम बे-शहर बे-सहर ही सही – विकाश कुमार

हम बे-शहर बे-सहर ही सही, ज़िंदगी हमारी दोपहर ही सही दिल में वफ़ा का गुमान तो है, वैसे सफ़र बे-हमसफ़र ही सही

कुछ बातें हैं… – विकाश कुमार

कुछ बातें हैं तुम कहो तो बता दूँ ‬ सब अच्छा कुछ बुरा भी जता दूँ बड़ी शिद्दत से पहुँचा हूँ मंज़िल पर कुछ याद आए तो घर का पता दूँ

घर लौटने में अब ज़माने निकल जाएँगे  – विकाश कुमार

शहर बदला हम फिर कमाने निकल जाएँगे   घर लौटने में अब ज़माने निकल जाएँगे 

काव्य की संरचना – विकाश कुमार

कविता और विचार के अन्त: सम्बन्धों पर चर्चा करते हुए अक्सर इस बात की अनदेखी की जाती रही है कि कविता किसी विचार की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति अथवा स्थिति का संवेदनात्मक वर्णन नहीं बल्कि अपने में एक चिन्तन-विधि है

सानवी सरीखी – विकाश कुमार

मेरी सरल कविता के अक्षर , गर पहुँच पाते अम्बर तेरी किलकारियाँ हरी भी सुनते, जड़ समान वशिभूत होकर । नन्ही नन्ही आँखों से , छुआ डाला मन के भीतर वो पहली मुस्कान तेरी , उज्जवल कर डाली हर दिशा प्रखर । एक कवि की कल्पना तू , एक गीत का तू स्वर मूर्तिकार की देवी … Continue reading सानवी सरीखी – विकाश कुमार