आइना टाल देता है – विकाश कुमार

रोज़ पूछता हूँ कौन है…
रोज़ आइना टाल देता है
इस साल कुछ बदलेंगे…
दिल क़रार हर साल देता है |

कहाँ को निकले थे …
कहाँ आ गए हैं ,
ख़ुद को ज़रूरतों में…
बहा आ गए हैं ,
जवाब ढूँढने से पहले…
बदल वो हर सवाल देता है

कहाँ से भटके थे…
अब तो ये ध्यान भी नहीं ,
पुरानी पगडंडियों पे …
अब तो निशान भी नहीं ,
मंज़िलों की अब तलब कहाँ…
हर कदम अब लौटने का ख़याल देता है

आँखों को नींद क़बूल नहीं …
करवटों में पत्थर, बबूल कहीं,
उस वक़्त एक सपना…
दम तोड़ देता है ,
जब इंसान हालत में …
ख़ुद को ढाल देता है |

– विकाश कुमार

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