कविता संग्रह

कभी शेर-ओ-नगमा बनके  – ख़ुमार बाराबंकवी

कभी शेर-ओ-नगमा बनके कभी आँसूओ में ढलके  वो मुझे मिले तो लेकिन, मिले सूरते बदलके कि वफा की सख़्त राहे कि तुम्हारे पाव नाज़ुक  न लो इंतकाम मुझसे मेरे साथ-साथ चलके

ये मिसरा नहीं है  – ख़ुमार बाराबंकवी

ये मिसरा नहीं है वज़ीफा मेरा है खुदा है मुहब्बत, मुहब्बत खुदा है कहूँ किस तरह में कि वो बेवफा है मुझे उसकी मजबूरियों का पता है हवा को बहुत सरकशी का नशा है  मगर ये न भूले दिया भी दिया है

दुनिया के ज़ोर प्यार के दिन याद आ गये  – ख़ुमार बाराबंकवी

दुनिया के ज़ोर प्यार के दिन याद आ गये  दो बाज़ुओ की हार के दिन याद आ गये गुज़रे वो जिस तरफ से बज़ाए महक उठी  सबको भरी बहार के दिन याद आ गये

बापू के प्रति – सुमित्रानंदन पंत

तुम मांस-हीन, तुम रक्तहीन, हे अस्थि-शेष! तुम अस्थिहीन, तुम शुद्ध-बुद्ध आत्मा केवल, हे चिर पुराण, हे चिर नवीन! तुम पूर्ण इकाई जीवन की, जिसमें असार भव-शून्य लीन; आधार अमर, होगी जिस पर

अँधियाली घाटी में – सुमित्रानंदन पंत

अँधियाली घाटी में सहसा हरित स्फुलिंग सदृश फूटा वह! वह उड़ता दीपक निशीथ का,-- तारा-सा आकर टूटा वह! जीवन के इस अन्धकार में मानव-आत्मा का प्रकाश-कण जग सहसा, ज्योतित कर देता मानस के चिर गुह्य कुंज-वन!

मिट्टी का गहरा अंधकार – सुमित्रानंदन पंत

मिट्टी का गहरा अंधकार डूबा है उसमें एक बीज,-- वह खो न गया, मिट्टी न बना, कोदों, सरसों से क्षुद्र चीज! उस छोटे उर में छिपे हुए हैं डाल-पात औ’ स्कन्ध-मूल,

ग्राम श्री – सुमित्रानंदन पंत

फैली खेतों में दूर तलक  मख़मल की कोमल हरियाली, लिपटीं जिससे रवि की किरणें  चाँदी की सी उजली जाली ! तिनकों के हरे हरे तन पर हिल हरित रुधिर है रहा झलक, श्यामल भू तल पर झुका हुआ नभ का चिर निर्मल नील फलक।

छोड़ द्रुमों की मृदु छाया – सुमित्रानंदन पंत

छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया,  बाले! तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन? भूल अभी से इस जग को! तज कर तरल तरंगों को, इन्द्रधनुष के रंगों को, 

देख तो दिल कि जाँ से उठता है – मीर तकी “मीर”

देख तो दिल कि जाँ से उठता है ये धुआं सा कहाँ से उठता है गोर किस दिल-जले की है ये फलक शोला इक सुबह याँ से उठता है खाना-ऐ-दिल से ज़िन्हार न जा कोई ऐसे मकान से उठता है

पर्वत प्रदेश – सुमित्रानंदन पंत

पावस ऋतु थी, पर्वत प्रदेश, पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश। मेखलाकर पर्वत अपार अपने सहस्‍त्र दृग-सुमन फाड़, अवलोक रहा है बार-बार नीचे जल में निज महाकार, -जिसके चरणों में पला ताल दर्पण सा फैला है विशाल!