हाले-ग़म उन को सुनाते जाइए शर्त ये है मुस्कुराते जाइए आप को जाते न देखा जाएगा शम्मअ को पहले बुझाते जाइए शुक्रिया लुत्फ़े-मुसलसल का मगर गाहे-गाहे दिल दुखाते जाइए
कविता संग्रह
इतने ऊँचे उठो – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है। देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से सिंचित करो धरा, समता की भाव वृष्टि से जाति भेद की, धर्म-वेश की काले गोरे रंग-द्वेष की ज्वालाओं से जलते जग में इतने शीतल बहो कि जितना मलय पवन है॥
तस्वीर बनाता हूँ तस्वीर नहीं बनती – ख़ुमार बाराबंकवी
तस्वीर बनाता हूँ तस्वीर नहीं बनती एक ख़्वाब सा देखा है ताबीर नहीं बनती बेदर्द मुहब्बत का इतना-सा है अफ़साना नज़रों से मिली नज़रें मैं हो गया दीवाना अब दिल के बहलने की तदबीर नहीं बनती
ऐ मौत उन्हें भुलाए ज़माने गुज़र गए – ख़ुमार बाराबंकवी
ऐ मौत उन्हें भुलाए ज़माने गुज़र गए आ जा कि ज़हर खाए ज़माने गुज़र गए ओ जाने वाले! आ कि तेरे इंतज़ार में रस्ते को घर बनाए ज़माने गुज़र गए
आँसूगदी से इश्क-ए-जवाँ – ख़ुमार बाराबंकवी
आँसूगदी से इश्क-ए-जवाँ को बचाइए कोई जो मान जाए तो खुद रूठ जाइए जश्न-ए-सूरूर बाए सनम पर मनाइए ये कुसूर है तो कुसूर का ईमान लाईए
दिल को तस्कीन-ए-यार ले डूबी – ख़ुमार बाराबंकवी
दिल को तस्कीन-ए-यार ले डूबी इस चमन को बहार ले डूबी
वो खफा है तो कोई बात नहीं – ख़ुमार बाराबंकवी
वो खफा है तो कोई बात नहीं इश्क मोहताज-ए-इल्त्फाक नहीं दिल बुझा हो अगर तो दिन भी है रात नहीं दिन हो रोशन तो रात रात नहीं
रुख़्सत-ए-शबाब – ख़ुमार बाराबंकवी
ऐसा नहीं कि हम से मुहब्ब्त नहीं रहीं, जस्बात में वो पहली सी शिद्दत नहीं रही सर में वो इंतज़ार का सौदा नहीं, रहा दिल पर वो धड़कनो की हुकूमत नहीं रहीं
क्या हुआ हुस्न है हमसफ़र या नहीं – ख़ुमार बाराबंकवी
क्या हुआ हुस्न है हमसफ़र या नहीं इश्क़ मंज़िल ही मंज़िल है रस्ता नहीं ग़म छुपाने से छुप जाए ऐसा नहीं बेख़बर तूने आईना देखा नहीं दो परिंदे उड़े आँख नम हो गई आज समझा के मैं तुझको भूला नहीं
तुम और तुम्हारा शहर – रुचिका मान ‘रूह’
एक अरसे पहले तेरे कूचे से निकले थे हम, अरमानों की उलझी हुई गाँठे लिए, बेवजह चलती हुई साँसों के साथ... और देख तो..एक मुद्दत बाद आज लौटे हैं, वैसा का वैसा ही है सब आज भी यहाँ...



