जेठ हो कि हो पूस, हमारे कृषकों को आराम नहीं है छूटे कभी संग बैलों का ऐसा कोई याम नहीं है मुख में जीभ शक्ति भुजा में जीवन में सुख का नाम नहीं है वसन कहाँ? सूखी रोटी भी मिलती दोनों शाम नहीं है बैलों के ये बंधू वर्ष भर क्या जाने कैसे जीते हैं बंधी जीभ, आँखें विषम गम खा शायद आँसू पीते हैं पर शिशु का क्या, सीख न पाया अभी जो आँसू पीना चूस-चूस सूखा स्तन माँ का, सो जाता रो-विलप नगीना
कविता संग्रह
हो गई मौन – हरिवंशराय बच्चन
हो गई मौन बुलबुले-हिंद! मधुबन की सहसा रुकी साँस, सब तरुवर-शाखाएँ उदास, अपने अंतर का स्वर खोकर बैठे हैं सब अलि विहग-वृंद! चुप हुई आज बुलबुले-हिन्द!
कलम या कि तलवार – रामधारी सिंह ‘दिनकर’
दो में से क्या तुम्हे चाहिए कलम या कि तलवार मन में ऊँचे भाव कि तन में शक्ति विजय अपार अंध कक्ष में बैठ रचोगे ऊँचे मीठे गान या तलवार पकड़ जीतोगे बाहर का मैदान कलम देश की बड़ी शक्ति है भाव जगाने वाली, दिल की नहीं दिमागों में भी आग लगाने वाली
हाथी-हाथी – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
हाथी-हाथी बाल दे, लोहे की दीवाल दे। हाथी-हाथी बाल दे, चाँदी की चौपाल दे।
चार क़तऐ – जावेद अख़्तर
कत्थई आँखों वाली इक लड़की एक ही बात पर बिगड़ती है तुम मुझे क्यों नहीं मिले पहले रोज़ ये कह के मुझ से लड़ती है
हमसे छल कीनो काना नेनवा लगायके – सूरदास
हमसे छल कीनो काना नेनवा लगायके जमुनाजलमें जीपें गेंद डारी कालि नागनाथ लाये । इंद्रको गुमान हर्यो गोवरधन धारके मोर मुगुट बांधे काली कामरी खांदे ।
भारती वन्दना – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”
भारति, जय, विजय करे कनक-शस्य-कमल धरे! लंका पदतल-शतदल गर्जितोर्मि सागर-जल धोता शुचि चरण-युगल स्तव कर बहु अर्थ भरे!
माध्यम – रामधारी सिंह ‘दिनकर’
मैं माध्यम हूँ, मौलिक विचार नहीं, कनफ़्युशियस ने कहा । तो मौलिक विचार कहाँ मिलते हैं, खिले हुए फूल ही नए वृन्तों पर दुबारा खिलते हैं ।
सुनो सिंहासन के रखवाले – आलोक पाण्डेय
कह रहा स्तब्धित खड़ा हिमालय, घुटता रो-रो सिंधु का नीर, हे भारत के सेवक जगो, क्यों मौन सुषुप्त पड़े अधीर ! क्रुर प्रहार झंझावातों में, जीवन नैया धीरों की डूब गयी, विस्फोटों को सहते-सहते , जनमानस उद्वेलित अब उब गयी । ले उफान गंगा की व्याकुल धारा , छोड़ किनारा उछल रही ; नर्मदा दुख से आहत हो , युद्ध हेतु दृढ़ सबल दे रही ।
भालू आया – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
लाठी लेकर भालू आया छम-छम छम-छम छम-छम-छम डुग-डुग डुग-डुग बजी डुगडुगी डम-डम डम-डम डम-डम-डम







