कविता संग्रह

जमुनाके तीर बन्सरी बजावे कानो – सूरदास

जमुनाके तीर बन्सरी बजावे कानो ॥ज०॥ध्रु०॥ बन्सीके नाद थंभ्यो जमुनाको नीर खग मृग।  धेनु मोहि कोकिला अनें किर ॥बं०॥१॥ सुरनर मुनि मोह्या रागसो गंभीर । 

बहाना ढूँढते रहते हैं  – जावेद अख़्तर

बहाना ढूँढते रहते हैं कोई रोने का हमें ये शौक़ है क्या आस्तीं भिगोने का अगर पलक पे है मोती तो ये नहीं काफ़ी हुनर भी चाहिए अल्फ़ाज़ में पिरोने का

दीप से दीप जले – माखनलाल चतुर्वेदी

सुलग-सुलग री जोत दीप से दीप मिलें कर-कंकण बज उठे, भूमि पर प्राण फलें। लक्ष्मी खेतों फली अटल वीराने में लक्ष्मी बँट-बँट बढ़ती आने-जाने में लक्ष्मी का आगमन अँधेरी रातों में लक्ष्मी श्रम के साथ घात-प्रतिघातों में लक्ष्मी सर्जन हुआ कमल के फूलों में लक्ष्मी-पूजन सजे नवीन दुकूलों में।।

समझ का फेर – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

है भरी कूट कूट कोर कसर। माँ बहन से करें न क्यों कुट्टी। लोग सहयोग कर सकें कैसे। है असहयोग से नहीं छुट्टी।1।

बस इक झिझक है यही – कैफ़ि आज़मी

बस इक झिझक है यही हाल-ए-दिल सुनाने में  कि तेरा ज़िक्र भी आयेगा इस फ़साने में  बरस पड़ी थी जो रुख़ से नक़ाब उठाने में  वो चाँदनी है अभी तक मेरे ग़रीब-ख़ाने में 

लड्डू ले लो – माखनलाल चतुर्वेदी

ले लो दो आने के चार लड्डू राज गिरे के यार यह हैं धरती जैसे गोल ढुलक पड़ेंगे गोल मटोल इनके मीठे स्वादों में ही बन आता है इनका मोल दामों का मत करो विचार

एक तुम हो – माखनलाल चतुर्वेदी

गगन पर दो सितारे: एक तुम हो, धरा पर दो चरण हैं: एक तुम हो, ‘त्रिवेणी’ दो नदी हैं! एक तुम हो,  हिमालय दो शिखर है: एक तुम हो,  रहे साक्षी लहरता सिंधु मेरा, कि भारत हो धरा का बिंदु मेरा ।

पशेमानी – कैफ़ि आज़मी

मैं ये सोच कर उस के दर से उठा था कि वो रोक लेगी मना लेगी मुझको कदम ऐसे अंदाज से उठ रहे थे कि वो आवाज़ देकर बुला लेगी मुझको हवाओं मे लहराता आता था दामन कि दामन पकड़ के बिठा लेगी मुझको

उलटी समझ – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

जाति ममता मोल जो समझें नहीं। तो मिलों से हम करें मैला न मन। देश-हित का रंग न जो गाढ़ा चढ़ा। तो न डालें गाढ़ में गाढ़ा पहन।1। धूल झोंकें न जाति आँखों में। फाड़ देवें न लाज की चद्दर। दर बदर फिर न देश को कोसें। मूँद हित दर न दें पहन खद्दर।2।

मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं – विकाश कुमार

चादरों पर अब सलवटें नहीं पड़ती कपड़े भी इधर उधर बिखरें नहीं ना नयी फ़रमाहिशे हैं हर दिन रोज़ अब यही कहानी है बच्चों के बिन क्यूँकि मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं