सुनो सिंहासन के रखवाले – आलोक पाण्डेय

जम्मू कश्मीर के पुलवामा जिले के अवंतिपुरा में आतंकी हमले में हुतात्मा वीरों के याद में शासनतंत्र को कर्तव्यबोध दिलाती एक कवि की भावपूर्ण कविता । 

कह रहा स्तब्धित खड़ा हिमालय, घुटता रो-रो सिंधु का नीर,
हे भारत के सेवक जगो, क्यों मौन सुषुप्त पड़े अधीर !
क्रुर प्रहार झंझावातों में, जीवन नैया धीरों की डूब गयी,
विस्फोटों को सहते-सहते , जनमानस उद्वेलित अब उब गयी ।
ले उफान गंगा की व्याकुल धारा , छोड़ किनारा उछल रही ;
नर्मदा दुख से आहत हो , युद्ध हेतु दृढ़ सबल दे रही ।
जिहादों से घूट-घुट , हर दिन वीर मरे जाते हैं,
विस्फोटों के धुएं में हर धीर कटे जाते हैं ।
आज वीर मरे जो हैं , धैर्य देश का डोला है ,
शासन की कर्तव्य बोध को जनमानस ने तोला है ।
बिलख रही कुमकुम रोली, बिलख रही नूपुर की झंकार,
बिलख रही हाथों की चूड़ियाँ , हाय ! बिलख रही मृदु कंठ-हार ,
बिलख रही धरा झंझावातों से, बिलख रही नयन नीर-धार ;
बिलख रही कैसी सौम्य सुरम्य प्रकृति , बिलख रही अखंड सौम्य श्रृंगार !

कारगिल की शौर्य पताका , नभोमंडल में डोल रही,
हे भारत के कर्णधार युद्ध कर अब बोल रही !
डोली शौर्य पताका वीर शिवा की, हल्दीघाटी भी डोली है ,
बिस्मिल की गजलें भी डोली , डोली वीर आजाद की गोली है ।
वीरों की माटी की धरती , अपने गद्दारों से डोल रही ;
अकर्मण्य , अदूरदर्शी , सत्तालोलुपों से , कड़क भाषा अब बोल रही !

हे सिंहासन के रखवाले , करो याद कर्तव्य करो विचार ,
सिसक रहा है सारा देश , सर्वत्र मची है करूण पुकार ,
धरणी सीमाओं पर तांडव करती , कैसी मानव की पशुता साकार ;
क्या व्यर्थ जाएगा यह बलिदान या कर पाओगे अमोघ प्रतिकार !

माथे का कलंक भयावह , जगे शौर्य कंटक दंश मिटे ;
शत्रु को धूल-धूसरित कर , फिदायीन जालों के पंख कटे ।
आतंक मिटाने में बाधक , किसी का मत तथ्य सुनो तुम ;
जिहादियों को राख कर दे , स्वाभिमानी उपक्रम चुनो तुम !
महा समर की बेला है , ले पाञ्चजन्य उद्घोष करो ;
शत्रु को मर्दन करने को , त्वरित आर्ष भाव में रोष भरो ।
सेना को आदेश थमा दो , भयावह विप्लव ध्वंस मचाने को ;
अपने गद्दारों सहित समूचे आतंकिस्तान विध्वंस कराने को ।

– आलोक पाण्डेय (वाराणसी, भारतभूमि )

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