बेघर – जावेद अख़्तर

शाम होने को है लाल सूरज समंदर में खोने को है और उसके परे  कुछ परिन्‍दे  क़तारें बनाए उन्‍हीं जंगलों को चले

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बहाना ढूँढते रहते हैं  – जावेद अख़्तर

बहाना ढूँढते रहते हैं कोई रोने का हमें ये शौक़ है क्या आस्तीं भिगोने का अगर पलक पे है मोती तो ये नहीं काफ़ी हुनर भी चाहिए अल्फ़ाज़ में पिरोने का

चार क़तऐ  – जावेद अख़्तर

कत्थई आँखों वाली इक लड़की एक ही बात पर बिगड़ती है तुम मुझे क्यों नहीं मिले पहले रोज़ ये कह के मुझ से लड़ती है

कुछ शेर  – जावेद अख़्तर

दर्द अपनाता है पराए कौन  कौन सुनता है और सुनाए कौन  कौन दोहराए वो पुरानी बात ग़म अभी सोया है जगाए कौन 

दर्द अपनाता है पराए कौन  – जावेद अख़्तर

दर्द अपनाता है पराए कौन  कौन सुनता है और सुनाए कौन  कौन दोहराए वो पुरानी बात ग़म अभी सोया है जगाए कौन 

ज़बान – जावेद अख़्तर

ये आवाज़ों की तस्वीरें कैसे बनी थीं आवाज़ें तस्वीर बनीं या तस्वीरें आवाज़ बनी थीं

मेरा आँगन मेरा पेड़ – जावेद अख़्तर

मेरा आँगन कितना कुशादा कितना बड़ा था जिसमें मेरे सारे खेल समा जाते थे