सेवा – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

देख पड़ी अनुराग-राग-रंजित रवितन में। छबि पाई भर विपुल-विभा नीलाभ-गगन में। बर-आभा कर दान ककुभ को दुति से दमकी। अन्तरिक्ष को चारु ज्योतिमयता दे चमकी। कर संक्रान्ति गिरि-सानु-सकल को कान्त दिखाई। शोभितकर तरुशिखा निराली-शोभा पाई। कलित बना कर कनक कलश को हुई कलित-तर। समधिक-धवलित सौधा-धाम कर बनी मनोहर।

जाना है दूर – रमानाथ अवस्थी

रोको मत जाने दो जाना है दूर वैसे तो जाने को मन ही होता नहीं, लेकिन है कौन यहाँ जो कुछ खोता नहीं  तुमसे मिलने का मन तो है मैं क्या करूँ? बोलो तुम कैसे कब तक मैं धीरज धरूँ । मुझसे मत पूछो मैं कितना मज़बूर । रोको मत जाने दो जाना है दूर

समझ का फेर – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

है भरी कूट कूट कोर कसर। माँ बहन से करें न क्यों कुट्टी। लोग सहयोग कर सकें कैसे। है असहयोग से नहीं छुट्टी।1। मेल बेमेल जाति से करके। हम मिटाते कलंक टीके हैं। जाति है जा रही मिटी तो क्या। रंग में मस्त यूनिटी के हैं।2।

रात की बात – रमानाथ अवस्थी

रात की बात, रात को होगी  दिन भर की आपाधापी से  मन का दर्पण धुँधलाया है । जिसने जितना दिया यहाँ पर  उसने उतना ही पाया है । सबकुछ पा लेने की धुन में  सबके सब दिखते हैं रोगी । 

उलटी समझ – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

जाति ममता मोल जो समझें नहीं। तो मिलों से हम करें मैला न मन। देश-हित का रंग न जो गाढ़ा चढ़ा। तो न डालें गाढ़ में गाढ़ा पहन।1। धूल झोंकें न जाति आँखों में। फाड़ देवें न लाज की चद्दर। दर बदर फिर न देश को कोसें। मूँद हित दर न दें पहन खद्दर।2।

मन – रमानाथ अवस्थी

मन को वश में करो फिर चाहे जो करो । कर्ता तो और है रहता हर ठौर है वह सबके साथ है दूर नहीं पास है तुम उसका ध्यान धरो । फिर चाहे जो करो । सोच मत बीते को हार मत जीते को गगन कब झुकता है समय कब रुकता है समय से मत लड़ो । फिर चाहे जो करो । रात वाला सपना सवेरे कब अपना रोज़ यह होता है व्यर्थ क्यों रोता है डर के मत मरो । फिर चाहे जो करो ।

चाहिए – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

राह पर उसको लगाना चाहिए। जाति सोती है जगाना चाहिए।1। हम रहेंगे यों बिगड़ते कब तलक। बात बिगड़ी अब बनाना चाहिए।2। खा चुके हैं आज तक मुँह की न कम। सब दिनों मुँह की न खाना चाहिए।3।

चुप रहिए – रमानाथ अवस्थी

देख रहे हैं जो भी, किसी से मत कहिए, मौसम ठीक नहीं है, आजकल चुप रहिए। कल कुछ देर किसी सूने में, मैंने कीं ख़ुद से कुछ बातें, लगा कि जैसे मुझे बुलाएँ बिन बाजों वाली बारातें। कोई नहीं मिला जो सुनता मुझसे मेरी हैरानी को, देखा सबने मुझे न देखा, मेरी आँखों के पानी को।

अपने दुखड़े – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

देश को जिस ने जगाया जगे सोने न दिया। आग घर घर में बुरी फूट को बोने न दिया।1। है वही बीर पिया दूध उसी ने माँ का। जाति को जिसने जिगर थाम के रोने न दिया।2। बन गये भोले बहुत, अपनी भलाई भूली। है इसी भूल ने अब तक भला होने न दिया।3।

चंदन – रमानाथ अवस्थी

चंदन है तो महकेगा ही आग में हो या आँचल में छिप न सकेगा रंग प्यार का चाहे लाख छिपाओ तुम कहने वाले सब कह देंगे कितना ही भरमाओ तुम घुंघरू है तो बोलेगा ही सेज में हो या साँकल में