दिल के फफोले -1 – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

जिसे सूझ कर भी नहीं सूझ पाता। नहीं बात बिगड़ी हुई जो बनाता। फिसल कर सँभलना जिसे है न आता। नहीं पाँव उखड़ा हुआ जो जमाता। पड़ेगा सुखों का उसे क्यों न लाला। सदा ही सहेगा न वह क्यों कसाला।

कभी कभी – रमानाथ अवस्थी

कभी कभी जब मेरी तबियत यों ही घबराने लगती है तभी ज़िन्दगी मुझे न जाने क्या-क्या समझाने लगती है रात, रात भर को ही मिलती दिन भी मिलता दिन भर को कोई पूरी तरह न मिलता रमानाथ लौटो घर को

कुछ उलटी सीधी बातें – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

जला सब तेल दीया बुझ गया है अब जलेगा क्या। बना जब पेड़ उकठा काठ तब फूले फलेगा क्या।1। रहा जिसमें न दम जिसके लहू पर पड़ गया पाला। उसे पिटना पछड़ना ठोकरें खाना खलेगा क्या।2। भले ही बेटियाँ बहनें लुटें बरबाद हों बिगड़ें। कलेजा जब कि पत्थर बन गया है तब गलेगा क्या।3।

इन्सान – रमानाथ अवस्थी

मैंने तोड़ा फूल, किसी ने कहा- फूल की तरह जियो औ मरो सदा इंसान । भूलकर वसुधा का शृंगार, सेज पर सोया जब संसार, दीप कुछ कहे बिना ही जला- रातभर तम पी-पीकर पला- दीप को देख, भर गए नयन उसी क्षण- बुझा दिया जब दीप, किसी ने कहा दीप की तरह जलो, तम हरो सदा इंसान ।

एक उकताया – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

क्या कहें कुछ कहा नहीं जाता। बिन कहे भी रहा नहीं जाता।1। बे तरह दुख रहा कलेजा है। दर्द अब तो सहा नहीं जाता।2। इन झड़ी बाँधा कर बरस जाते। आँसुओं में बहा नहीं जाता।3।

क्या होगा – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

बहँक कर चाल उलटी चल कहो तो काम क्या होगा। बड़ों का मुँह चिढ़ा करके बता दो नाम क्या होगा।1। बही जी में नहीं जो बेकसों के प्यार की धारा। बता दो तो बदन चिकना व गोरा चाम क्या होगा।2। दुखी बेवों यतीमों की कभी सुधा जो नहीं ली तो। जामा किस काम आवेगी व यह धान धाम क्या होगा।3।

असम्भव – रमानाथ अवस्थी

ऐसा कहीं होता नहीं ऐसा कभी होगा नहीं। धरती जले बरसे न घन, सुलगे चिता झुलसे न तन। औ ज़िंदगी में हों न ग़म। ऐसा कभी होगा नहीं ऐसा कभी होता नहीं।

याद बन-बनकर गगन पर – रमानाथ अवस्थी

याद बन-बनकर गगन पर साँवले घन छा गए हैं ये किसी के प्यार का संदेश लाए या किसी के अश्रु ही परदेश आए । श्याम अंतर में गला शीशा दबाए उठ वियोगिनी देख घर मेहमान आए । धूल धोने पाँव की सागर गगन पर आ गए हैं 

हमें नहीं चाहिए – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

आप रहे कोरा शरीर के बसन रँगावे। घर तज कर के घरबारी से भी बढ़ जावे। इस प्रकार का नहीं चाहिए हम को साधू। मन तो मूँड़ न सके मूँड़ को दौड़ मुड़ावे।1। मन का मोह न हरे, राल धान पर टपकावे। मुक्ति बहाने भूल भूलैयाँ बीच फँसावे। हमें चाहिए गुरू नहीं ऐसा अविवेकी। जो न लोक का रखे न तो परलोक बनावे।2।

हमें चाहिए – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

कपड़े रँग कर जो न कपट का जाल बिछावे। तन पर जो न विभूति पेट के लिए लगावे। हमें चाहिए सच्चे जी वाला वह साधू। जाति देश जगहित कर जो निज जन्म बनाये।1। देशकाल को देख चले निजता नहिं खोवे। सार वस्तु को कभी पखंडों में न डुबोवे। हमें चाहिए समझ बूझ वाला वह पंडित। आँखें ऊँची रखे कूपमंडूक न होवे।2।