कौन सिखाता है चिड़ियों को चीं-चीं, चीं-चीं करना? कौन सिखाता फुदक-फुदक कर उनको चलना फिरना? कौन सिखाता फुर्र से उड़ना दाने चुग-चुग खाना? कौन सिखाता तिनके ला-ला कर घोंसले बनाना? कौन सिखाता है बच्चों का लालन-पालन उनको? माँ का प्यार, दुलार, चौकसी कौन सिखाता उनको?
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मूल मंत्र – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
केवल मन के चाहे से ही मनचाही होती नहीं किसी की। बिना चले कब कहाँ हुई है मंज़िल पूरी यहाँ किसी की।। पर्वत की चोटी छूने को पर्वत पर चढ़ना पड़ता है। सागर से मोती लाने को गोता खाना ही पड़ता है।।
आओ प्यारे तारो आओ – महादेवी वर्मा
आओ, प्यारे तारो आओ तुम्हें झुलाऊँगी झूले में, तुम्हें सुलाऊँगी फूलों में, तुम जुगनू से उड़कर आओ, मेरे आँगन को चमकाओ।
कुसुम चयन – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
जो न बने वे विमल लसे विधु-मौलि मौलि पर। जो न बने रमणीय सज, रमा-रमण कलेवर। बर बृन्दारक बृन्द पूज जो बने न बन्दित। जो न सके अभिनन्दनीय को कर अभिनन्दित। जो विमुग्धा कर हुए वे न बन मंजुल-माला। जो उनसे सौरभित प्रेम का बना न प्याला। कर के नृप-कुल-तिलक क्रीट-रत्नों को रंजित। कर न सके जो कलित-कुसुम-कुल महिमा व्यंजित। जो न सुबासित हुआ तेल उनसे वह आला। जिसने सुखमय व्यथित-जीव-जीवन कर डाला।
अविनय – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
ढाल पसीना जिसे बड़े प्यारों से पाला। जिसके तन में सींच सींच जीवन-रस डाला। सुअंकुरित अवलोक जिसे फूला न समाया। पा करके पल्लवित जिसे पुलकित हो आया। वह पौधा यदि न सुफल फले तो कदापि न कुफल फले। अवलोक निराशा का बदन नीर न आँखों से ढले।1।
भोर का उठना – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
भोर का उठना है उपकारी। जीवन-तरु जिससे पाता है हरियाली अति प्यारी। पा अनुपम पानिप तन बनता है बल-संचय-कारी। पुलकित, कुसुमित, सुरभित, हो जाती है जन-उर-क्यारी। लालिमा ज्यों नभ में छाती है। त्यों ही एक अनूठी धारा अवनी पर आती है। परम-रुचिरता-सहित सुधा-बृंदों सी बरसाती है। रसमय, मुदमय, मधुर नादमय सब ही दिशा बनाती है। तृण, वीरुधा, तरु, लता, वेलि को प्रतिपल पुलकाती है। बन उपवन में रुचिर मनोहर कुसुम-चय खिलाती है। प्रान्तर-नगर-ग्राम-गृह-पुर में सजीवता लाती है। उर में उमग पुलक तन में दुति दृग में उपजाती है। सदा भोर उठने वालों की यह प्यारी थाती है। यह न्यारी-निधि बड़े भाग वाली जनता पाती है।
सुशिक्षा-सोपान – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
जी लगा पोथी अपनी पढ़ो। केवल पढ़ो न पोथी ही को, मेरे प्यारे कढ़ो। कभी कुपथ में पाँव न डालो, सुपथ ओर ही बढ़ो। भावों की ऊँची चोटी पर बड़े चाव से चढ़ो। सुमति-खंजरी को मानवता-रुचि-चाम से मढ़ो। बन सोनार सम परम-मनोहर पर-हित गहने गढ़ो।1।
जिसे नहीं कुछ चाहिए – रमानाथ अवस्थी
जिसे नहीं कुछ चाहिए, वही बड़ा धनवान । लेकिन धन से भी बड़ा, दुनिया में इन्सान । चारों तरफ़ मची यहाँ भारी रेलमपेल । चोर उचक्के ख़ुश बहुत, सज्जन काटें जेल । मतलब की सब दोस्ती देख लिया सौ बार । काम बनाकर हो गया, जिगरी दोस्त फ़रार ।
सेवा -1 – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
जो मिठाई में सुधा से है अधिक। खा सके वह रस भरा मेवा नहीं। तो भला जग में जिये तो क्या जिये। की गयी जो जाति की सेवा नहीं।1। हो न जिसमें जातिहित का रंग कुछ। बात वह जी में ठनी तो क्या ठनी। हो सकी जब देश की सेवा नहीं। तब भला हमसे बनी तो क्या बनी।2।
वह एक दर्पण चाहिए – रमानाथ अवस्थी
हर दर्द झूठा लग रहा सह कर मजा आता नहीं आँसू वही आँखें वही कुछ है ग़लत कुछ है सही जिसमें नया कुछ दिख सके वह एक दर्पण चाहिए राहें पुरानी पड़ गईं आख़िर मुसाफ़िर क्या करे! सम्भोग से संन्यास तक आवास से आकाश तक भटके हुए इनसान को कुछ और जीवन चाहिए!




