तक़ाज़ा हसरतों का था, तमन्नाओं की बेकली, बेख़ुदी में चलते चलते, आ गए उनकी गली, अंदाज़-ए-रवैया कूचे ने बेज़ार कर दिया। लोगों ने आँखें फेर कर सलाम कर लिया।
Category: हिंदी कविताएँ
तरंगिणी – ज्ञान प्रकाश सिंह
निस्तब्ध निशा के अंचल में तारा गण अंकित पट लिपटी, युग तट बंधों के ओट छिपी कलनाद किये बहती जाती। कभी चक्र में, कभी वक्र में लहराती मुड़ती बलखाती, ऋजु रेखा में सरला बनकर मंद मंद मुस्काती चलती।
ख़ामोश लम्हे – ज्ञान प्रकाश सिंह
धुँधलके में लिपटी आई है शाम, इन्तिज़ार की बेचैनी छिपाए हुए, हवाओं में तैरते एहसासों से, तमन्नाओं की लहरें बिखरती रहीं। तन्हाई के लम्हे ख़ामोश थे,शाम-ए-ग़म की फितरत परेशान थी, तस्कीने इज़्तिराब बेहासिल रहा, बेबसी गिर्दो पेश फिरती रही।
मिलन-विरह – ज्ञान प्रकाश सिंह
गहन निशा के मृदु अंचल में, किसी पथिक की स्वर लहरी सा, तेरा अंचल पट लहराता । आँखों की गहरी अरुणाई और नींद से बोझिल पलकें अलसाया सा गात तुम्हारा, क्या बतलातीं उलझी अलकें और याद कर मिलन क्षणों को, संध्या में रवि के ढलने पर, जलने वाले प्रथम दिये सा, तेरा मुख रक्तिम हो उठता ।
ज़िंदगी – ज्ञान प्रकाश सिंह
ज़िंदगी की उलझनों में यों न गुज़रा कीजिये, चंद लम्हे लुत्फ़-ए-क़ुदरत-ए-नज़ारा लीजिये। उन्हें भी साँस लेने को थोड़ी जगह तो दीजिये, हसरत-ए-दिल का गिरीबाँ यों न मसला कीजिये।
बी.एच.यू. की छात्राओं के प्रति – ज्ञान प्रकाश सिंह
वह कौन बैठा है वहाँ, बंशी बजाता चैन की जल रहा उद्यान विद्या का, लेकिन उसे चिंता नहीं। लाठी चार्ज करवाया, निहत्थी छात्राओं पर तुम उस नीरो की बंशी तोड़ यदि देती तो बेहतर था।
नारी शक्ति – ज्ञान प्रकाश सिंह
बेड़ियाँ पिघल रहीं, प्रचंड नाद हो रहा बंधन विमुक्त हो रहे, निनाद घोर हो रहा। सामाजिक वर्जनाओं पर,रूढ़ियों ढकोसलों पर कुत्सित मान्यताओं पर, प्रबल प्रहार हो रहा।
वासंती मौसम याद रहा – ज्ञान प्रकाश सिंह
वासंती मौसम याद रहा, पतझड़ का मौसम भूल गए बाग़ों की बहारें याद रहीं, पत्तों का गिरना भूल गए। शहर पुराना लोग नए थे, सतरंगी दुनिया क्या कहिये वह बॉडी लैंग्वेज याद रही, अंदर की केमिस्ट्री भूल गए।
मनुष्यता – रामधारी सिंह ‘दिनकर’
है बहुत बरसी धरित्री पर अमृत की धार; पर नहीं अब तक सुशीतल हो सका संसार| भोग लिप्सा आज भी लहरा रही उद्दाम; बह रही असहाय नर कि भावना निष्काम| लक्ष्य क्या? उद्देश्य क्या? क्या अर्थ?
कच्ची उम्र के पक्के साथी – ज्ञान प्रकाश सिंह
वह उम्र भले ही कच्ची थी, पर तब के साथी पक्के थे। वह निश्छलता की दुनिया थी जिससे पटती दिल से पटती वे हमको अच्छे लगते थे, हम उनको अच्छे लगते थे। वह उम्र भले ही कच्ची थी, पर तब के साथी पक्के थे। वह स्वार्थ रहित नाता होता, भोला होता भावुक होता


