आँखें फेर सलाम कर लिया – ज्ञान प्रकाश सिंह

तक़ाज़ा हसरतों का था, तमन्नाओं की बेकली,
बेख़ुदी में चलते चलते, आ गए उनकी गली,
अंदाज़-ए-रवैया कूचे ने बेज़ार कर दिया।
लोगों ने आँखें फेर कर सलाम कर लिया।

उनके कूचे का वहाँ, हमने मंज़र अजब देखा,
हवायें अजनबी सी थीं, फ़िज़ा बदली हुई देखा,
नज़रे इशारा बेरुख़ी का, बेमुरव्वत कर दिया।
लोगों ने आँखें फेर कर सलाम कर लिया।

सरीरत तो न थी कोई, उनके कूचे में हम जाते,
इतना ही इरादा था कि उनसे हाले दिल कहते,
पर सब ने हमें मुफ़्त में बदनाम कर दिया।
लोगों ने आँखें फेर कर सलाम कर लिया।

बेहतर तो यही होता कि उनसे दिल न लगता,
दिल को सुकून रहता, दिन चैन से गुज़रता,
पर दिल लगी ने,क्या करें, लाचार कर दिया।
लोगों ने आँखें फेर कर सलाम कर लिया।

– ज्ञान प्रकाश सिंह

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