कविता संग्रह

पवन ने कहा – कुमार विश्वास

पवन ने कहा सौंप दो मुझे अपना सब सत्व तमस व रजत चाहती हूँ मैं स्वयं से जोड़ना तुमको यही होगी गति उत्तम शब्द सार्थक नियति उत्तम किन्तु मुझे करना

जुगनू – हरिवंशराय बच्चन

अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है? उठी ऐसी घटा नभ में छिपे सब चांद औ' तारे, उठा तूफान वह नभ में गए बुझ दीप भी सारे,

मैं नीर भरी दु:ख की बदली – महादेवी वर्मा

मैं नीर भरी दु:ख की बदली! स्पंदन में चिर निस्पंद बसा, क्रन्दन में आहत विश्व हंसा, नयनों में दीपक से जलते, पलकों में निर्झरिणी मचली!

हुर्फ – सज सोलापुर

किसीने कहा हर एक के हुर्फ रंग लाते है, कुछ अपने भी लिखलो, हमने भी दिल कि स्याही से कुछ हुर्फ लिख डाले, जो कि हवाओं मे घुल गये, अब शिकायत करे भी तो किससे?, हवाओं से?, हुर्फो से? या दिल से?, तडपने का मौसम गुजरा तो जवाब आया,

नेह के सन्दर्भ बौने हो गए – कुमार विश्वास

नेह के सन्दर्भ बौने हो गए होंगे मगर, फिर भी तुम्हारे साथ मेरी भावनायें हैं, शक्ति के संकल्प बोझिल हो गये होंगे मगर, फिर भी तुम्हारे चरण मेरी कामनायें हैं, हर तरफ है भीड़ ध्वनियाँ और चेहरे हैं अनेकों, तुम अकेले भी नहीं हो, मैं अकेला भी नहीं हूँ 

जाने किस जीवन की सुधि ले – महादेवी वर्मा

जाने किस जीवन की सुधि ले लहराती आती मधु-बयार! रंजित कर ले यह शिथिल चरण, ले नव अशोक का अरुण राग, मेरे मण्डन को आज मधुर, ला रजनीगन्धा का पराग; यूथी की मीलित कलियों से अलि, दे मेरी कबरी सँवार।

साथी, सब कुछ सहना होगा! – हरिवंशराय बच्चन

साथी, सब कुछ सहना होगा! मानव पर जगती का शासन, जगती पर संसृति का बंधन, संसृति को भी और किसी के प्रतिबंधो में रहना होगा! साथी, सब कुछ सहना होगा!

देवदास मत होना – कुमार विश्वास

खुद से भी मिल न सको, इतने पास मत होना इश्क़ तो करना, मगर देवदास मत होना देखना, चाहना, फिर माँगना, या खो देना ये सारे खेल हैं, इनमें उदास मत होना जो भी तुम चाहो, फ़क़त चाहने से मिल जाए ख़ास तो होना, पर इतने भी ख़ास मत होना

फितूर – विकास कुमार

प्रश्नों को , दायरे में ही रहने दो, जो कहते हैं हम  वही तुम होने दो। पथ्थरों को,  पूजती है दुनिया,  तो क्या------- इंसान जो पथ्थर हैं  पथ्थर ही रहने दो।

मधुर-मधुर मेरे दीपक – महादेवी वर्मा

मधुर-मधुर मेरे दीपक जल! युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल प्रियतम का पथ आलोकित कर! सौरभ फैला विपुल धूप बन मृदुल मोम-सा घुल रे, मृदु-तन! दे प्रकाश का सिन्धु अपरिमित, तेरे जीवन का अणु गल-गल पुलक-पुलक मेरे दीपक जल!