तुम समझ तो रही हो न, प्रीतो! वे सब बातें जो मैं इस सूने कमरे की दीवारों को समझा रहा हूँ आधी रात से
कविता संग्रह
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं! – हरिवंशराय बच्चन
अगणित उन्मादों के क्षण हैं, अगणित अवसादों के क्षण हैं, रजनी की सूनी की घडियों को किन-किन से आबाद करूं मैं! क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं! याद सुखों की आसूं लाती, दुख की, दिल भारी कर जाती, दोष किसे दूं जब अपने से, अपने दिन बर्बाद करूं मैं! क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं!
बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ – महादेवी वर्मा
बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ! नींद थी मेरी अचल निस्पन्द कण कण में, प्रथम जागृति थी जगत के प्रथम स्पन्दन में, प्रलय में मेरा पता पदचिन्ह जीवन में, शाप हूँ जो बन गया वरदान बंधन में कूल भी हूँ कूलहीन प्रवाहिनी भी हूँ! बीन भी हूँ मैं...
प्रीतो – कुमार विश्वास
तुम समझ तो रही हो न, प्रीतो! वे सब बातें जो मैं इस सूने कमरे की दीवारों को समझा रहा हूँ आधी रात से
कोई पार नदी के गाता – हरिवंशराय बच्चन
कोई पार नदी के गाता! भंग निशा की नीरवता कर, इस देहाती गाने का स्वर, ककड़ी के खेतों से उठकर, आता जमुना पर लहराता! कोई पार नदी के गाता!
तुम मुझमें प्रिय, फिर परिचय क्या! – महादेवी वर्मा
तारक में छवि, प्राणों में स्मृति पलकों में नीरव पद की गति लघु उर में पुलकों की संस्कृति भर लाई हूँ तेरी चंचल और करूँ जग में संचय क्या?
आँख का आँसू – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
आँख का आँसू ढलकता देख कर। जी तड़प करके हमारा रह गया। क्या गया मोती किसी का है बिखर। या हुआ पैदा रतन कोई नया। ओस की बूँदें कमल से हैं कढ़ी। या उगलती बूँद हैं दो मछलियाँ। या अनूठी गोलियाँ चाँदी मढ़ी। खेलती हैं खंजनों की लड़कियाँ।
प्यार जब जिस्म की चीखों में दफ़न हो जाए – कुमार विश्वास
प्यार जब जिस्म की चीखों में दफ़न हो जाए, ओढ़नी इस तरह उलझे कि कफ़न हो जाए, घर के एहसास जब बाजार की शर्तो में ढले, अजनबी लोग जब हमराह बन के साथ चले, लबों से आसमां तक सबकी दुआ चुक जाए, भीड़ का शोर जब कानो के पास रुक जाए,
कहते हैं तारे गाते हैं – हरिवंशराय बच्चन
सन्नाटा वसुधा पर छाया, नभ में हमनें कान लगाया, फ़िर भी अगणित कंठो का यह राग नहीं हम सुन पाते हैं कहते हैं तारे गाते हैं स्वर्ग सुना करता यह गाना, पृथ्वी ने तो बस यह जाना, अगणित ओस-कणों में तारों के नीरव आंसू आते हैं कहते हैं तारे गाते हैं
तेरी सुधि बिन क्षण क्षण सूना – महादेवी वर्मा
तेरी सुधि बिन क्षण क्षण सूना। कम्पित कम्पित, पुलकित पुलकित, परछाईं मेरी से चित्रित, रहने दो रज का मंजु मुकुर, इस बिन श्रृंगार-सदन सूना! तेरी सुधि बिन क्षण क्षण सूना।




