संस्रिति के विस्तृत सागर में सपनो की नौका के अंदर दुख सुख कि लहरों मे उठ गिर बहता जाता, मैं सो जाता । आँखों में भरकर प्यार अमर आशीष हथेली में भरकर कोई मेरा सिर गोदी में रख सहलाता, मैं सो जाता ।
कविता संग्रह
बया हमारी चिड़िया रानी – महादेवी वर्मा
तिनके लाकर महल बनाती, ऊँची डाली पर लटकाती, खेतों से फिर दाना लाती, नदियों से भर लाती पानी। तुझको दूर न जाने देंगे, दानों से आँगन भर देंगे, और हौज़ में भर देंगे हम- मीठा-मीठा ठंडा पानी।
दुःखी मत हो – कुमार विश्वास
सार्त्र! तुम्हें आदमी के अस्तित्व की चिंता है न? दुःखी मत हो दार्शनिक मैं तुम्हें सुझाता हूँ क्षणों को पूरे आत्मबोध के साथ जीते हुए आदमज़ाद की सही तस्वीर दिखाता हूँ- भागती ट्रामों दौड़ती कारों
अभीप्सा – विकास कुमार
भरी दोपहरी गर्म रेत तपते मरुथल बढ़ती पिपासा मरुधान हैं जिस ओर रे मन चल उस ओर
मिटने का अधिकार – महादेवी वर्मा
वे मुस्काते फूल, नहीं जिनको आता है मुरझाना, वे तारों के दीप, नहीं जिनको भाता है बुझ जाना!
किस कर में यह वीणा धर दूँ? – हरिवंशराय बच्चन
देवों ने था जिसे बनाया, देवों ने था जिसे बजाया, मानव के हाथों में कैसे इसको आज समर्पित कर दूँ? किस कर में यह वीणा धर दूँ?
तुम्हें मैं प्यार नहीं दे पाऊँगा – कुमार विश्वास
ओ कल्पव्रक्ष की सोनजुही! ओ अमलताश की अमलकली! धरती के आतप से जलते... मन पर छाई निर्मल बदली... मैं तुमको मधुसदगन्ध युक्त संसार नहीं दे पाऊँगा| तुम मुझको करना माफ तुम्हें मैं प्यार नहीं दे पाऊँगा|
कौन तुम मेरे हृदय में ? – महादेवी वर्मा
कौन तुम मेरे हृदय में? कौन मेरी कसक में नित मधुरता भरता अलक्षित? कौन प्यासे लोचनों में घुमड़ घिर झरता अपरिचित?
कवि की वासना – हरिवंशराय बच्चन
कह रहा जग वासनामय हो रहा उद्गार मेरा! 1. सृष्टि के प्रारंभ में मैने उषा के गाल चूमे, बाल रवि के भाग्य वाले दीप्त भाल विशाल चूमे, प्रथम संध्या के अरुण दृग चूम कर मैने सुलाए, तारिका-कलि से सुसज्जित नव निशा के बाल चूमे, वायु के रसमय अधर पहले सके छू होठ मेरे मृत्तिका की पुतलियो से आज क्या अभिसार मेरा? कह रहा जग वासनामय हो रहा उद्गार मेरा!
जाओ कल्पित साथी मन के – हरिवंशराय बच्चन
जाओ कल्पित साथी मन के! जब नयनों में सूनापन था, जर्जर तन था, जर्जर मन था, तब तुम ही अवलम्ब हुए थे मेरे एकाकी जीवन के! जाओ कल्पित साथी मन के




