उम्र बाँटने वाले उस ठरकी बूढ़े ने दिन लपेट कर भेज दिए हैं नए कैलेंडर की चादर में इनमें कुछ तो ऐसे होंगे जो हम दोनों के साझे हों। सब से पहले उन्हें छाँट कर गिन तो लूँ मैं!
Category: कुमार विश्वास
कुमार विश्वास हिन्दी के एक अग्रणी कवि तथा सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता हैं। कुमार विश्वास का जन्म 10 फ़रवरी (वसंत पंचमी), 1970 को पिलखुआ, (ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। कविता के क्षेत्र में शृंगार के गीत इनकी विशेषता है। डॉ॰ कुमार विश्वास ने अपना करियर राजस्थान में प्रवक्ता के रूप में 1994 में शुरू किया। तत्पश्चात वो अब तक महाविद्यालयों में अध्यापन कार्य कर रहे हैं। इसके साथ ही डॉ॰ विश्वास हिन्दी कविता मंच के सबसे व्यस्ततम कवियों में से हैं। उन्होंने अब तक हज़ारों कवि-सम्मेलनों में कविता पाठ किया है। साथ ही वह कई पत्रिकाओं में नियमित रूप से लिखते हैं। डॉ॰ विश्वास मंच के कवि होने के साथ साथ हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री के गीतकार भी हैं। उनके द्वारा लिखे गीत अगले कुछ दिनों में फ़िल्मों में दिखाई पड़ेगी। उन्होंने आदित्य दत्त की फ़िल्म ‘चाय-गरम’ में अभिनय भी किया है।
विभिन्न पत्रिकाओं में नियमित रूप से छपने के अलावा डॉ॰ कुमार विश्वास की दो पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं- ‘इक पगली लड़की के बिन’ (1996) और ‘कोई दीवाना कहता है’ (2007 और 2010 दो संस्करण में)[3]. विख्यात लेखक स्वर्गीय धर्मवीर भारती ने डॉ॰ विश्वास को इस पीढ़ी का सबसे ज़्यादा सम्भावनाओं वाला कवि कहा है। प्रथम श्रेणी के हिन्दी गीतकार ‘नीरज’ जी ने उन्हें ‘निशा-नियामक’ की संज्ञा दी है। मशहूर हास्य कवि डॉ॰ सुरेन्द्र शर्मा ने उन्हें इस पीढ़ी का एकमात्र ISO: 2006 कवि कहा है।
विदा लाडो – कुमार विश्वास
विदा लाडो! तुम्हे कभी देखा नहीं गुड़िया, तुमसे कभी मिला नहीं लाडो! मेरी अपनी दुनिया की अनोखी उलझनों में और तुम्हारी ख़ुद की थपकियों से गढ़ रही तुम्हारी अपनी दुनिया की छोटी-छोटी सी घटत-बढ़त में,
हाथों में तिरंगा हो – कुमार विश्वास
दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो
माँ – कुमार विश्वास
माँ पालती है पेड़ एक लाड़ से प्यार से दुलार से। माँ सुलाती है लोरी गा पिलाती है दूध लुटाती है तन मन प्राण
तुम्हारा फ़ोन आया है – कुमार विश्वास
अजब सी ऊब शामिल हो गयी है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चैखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अंगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
हो काल गति से परे चिरंतन – कुमार विश्वास
हो काल गति से परे चिरंतन, अभी यहाँ थे अभी यही हो। कभी धरा पर कभी गगन में, कभी कहाँ थे कभी कहीं हो। तुम्हारी राधा को भान है तुम, सकल चराचर में हो समाये। बस एक मेरा है भाग्य मोहन,
हार गया – कुमार विश्वास
हार गया तन-मन पुकार कर तुम्हें कितने एकाकी हैं प्यार कर तुम्हें जिस पल हल्दी लेपी होगी तन पर माँ ने जिस पल सखियों ने सौंपी होंगीं सौगातें ढोलक की थापों में, घुँघरू की रुनझुन में घुल कर फैली होंगीं घर में प्यारी बातें
सफ़ाई मत देना! – कुमार विश्वास
एक शर्त पर मुझे निमन्त्रण है मधुरे स्वीकार सफ़ाई मत देना! अगर करो झूठा ही चाहे, करना दो पल प्यार सफ़ाई मत देना
रूह जिस्म का ठौर ठिकाना – कुमार विश्वास
रूह जिस्म का ठौर ठिकाना चलता रहता है जीना मरना खोना पाना चलता रहता है सुख दुख वाली चादर घटती वढती रहती है मौला तेरा ताना वाना चलता रहता है इश्क करो तो जीते जी मर जाना पड़ता है मर कर भी लेकिन जुर्माना चलता रहता है
रंग दुनिया ने दिखाया है – कुमार विश्वास
रंग दुनिया ने दिखाया है निराला, देखूँ है अँधेरे में उजाला, तो उजाला देखूँ आइना रख दे मेरे हाथ में, आख़िर मैं भी कैसा लगता है तेरा चाहने वाला देखूँ जिसके आँगन से खुले थे मेरे सारे रस्ते उस हवेली पे भला कैसे मैं ताला देखूँ





