कविता संग्रह

आदर्श – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

लोक को रुलाता जो था राम ने रुलाया उसे हम खल खलता के खले हैं कलपते। काँपता भुवन का कँपाने वाला उन्हें देख हम हैं बिलोक बल-वाले को बिलपते। हरिऔधा वे थे ताप-दाता ताप-दायकों के हम नित नये ताप से हैं आप तपते। रोम रोम में जो राम-काम रमता है नहीं नाम के लिए तो राम नाम क्या हैं जपते।1।

बुलावा – रमानाथ अवस्थी

प्यार से मुझको बुलाओगे जहाँ एक क्या सौ बार आऊँगा वहाँ पूछने की है नहीं फ़ुर्सत मुझे कौन हो तुम क्या तुम्हारा नाम है किस लिए मुझको बुलाते हो कहाँ कौन सा मुझसे तुम्हारा काम है

जग के उर्वर-आँगन में – सुमित्रानंदन पंत

जग के उर्वर-आँगन में बरसो ज्योतिर्मय जीवन! बरसो लघु-लघु तृण, तरु पर हे चिर-अव्यय, चिर-नूतन!

प्यार का जश्न – कैफ़ि आज़मी

प्यार का जश्न नई तरह मनाना होगा ग़म किसी दिल में सही ग़म को मिटाना होगा काँपते होंटों पे पैमान-ए-वफ़ा क्या कहना तुझ को लाई है कहाँ लग़्ज़िश-ए-पा क्या कहना मेरे घर में तिरे मुखड़े की ज़िया क्या कहना आज हर घर का दिया मुझ को जलाना होगा

कमनीय कामनाएँ – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

वर-विवेक कर दान सकल-अविवेक निवारे। दूर करे अविनार सुचारु विचार प्रचारे। सहज-सुतति को बितर कुमति-कालिमा नसावे। करे कुरुचि को विफल सुरुचि को सफल बनावे। भावुक-मन-सुभवन में रहे प्रतिभा-प्रभा पसारती। भव-अनुपम-भावों से भरित भारत-भूतल-भारती।1।

उस समय भी – रमानाथ अवस्थी

जब हमारे साथी-संगी हमसे छूट जाएँ जब हमारे हौसलों को दर्द लूट जाएँ जब हमारे आँसुओं के मेघ टूट जाएँ उस समय भी रुकना नहीं, चलना चाहिए, टूटे पंख से नदी की धार ने कहा ।

श्री सूर्यकांत त्रिपाठी के प्रति – सुमित्रानंदन पंत

छंद बंध ध्रुव तोड़, फोड़ कर पर्वत कारा अचल रूढ़ियों की, कवि! तेरी कविता धारा मुक्त अबाध अमंद रजत निर्झर-सी नि:सृत-- गलित ललित आलोक राशि, चिर अकलुष अविजित! स्फटिक शिलाओं से तूने वाणी का मंदिर

नए ख़ाके – कैफ़ि आज़मी

नुक़ूश-ए-हसरत मिटा के उठना, ख़ुशी का परचम उड़ा के उठना मिला के सर बैठना मुबारक तराना-ए-फ़त्ह गा के उठना ये गुफ़्तुगू गुफ़्तुगू नहीं है बिगड़ने बनने का मरहला है धड़क रहा है फ़ज़ा का सीना कि ज़िन्दगी का मुआमला है ख़िज़ाँ रहे या बहार आए तुम्हारे हाथों में फ़ैसला है न चैन बे-ताब बिजलियों को न मुतमइन कारवान-ए-शबनम कभी शगूफ़ों के गर्म तेवर कभी गुलों का मिज़ाज बरहम शगूफ़ा ओ गुल के इस तसादुम में गुल्सिताँ बन गया जहन्नम

प्रार्थना – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

हे दीनबंधु दया-निकेतन विहग-केतन श्रीपते। सब शोक-शमन त्रिताप-मोचन दुख-दमन जगतीपते। भव-भीति-भंजन दुरित-गंजन अवनि-जन-रंजन विभो। बहु-बार जन-हित-अवतरित ऐ अति-उदार-चरित प्रभो

सारी रात – रमानाथ अवस्थी

धीरे-धीरे बात करो सारी रात प्यार से । भोर होते चाँद के ही साथ-साथ जाऊँगा हो सका तो शाम को सितारों के संग आऊँगा धीरे-धीरे ताप हरो प्यार के अंगार से | तन का सिंगार तो हज़ार बार होता है किंतु प्यार जीवन में एक बार होता है धीरे-धीरे बूँद चुनो ज़िन्दगी की धार से ।