कविता संग्रह

घंटा – सुमित्रानंदन पंत

नभ की है उस नीली चुप्पी पर  घंटा है एक टंगा सुन्दर,  जो घडी घडी मन के भीतर  कुछ कहता रहता बज बज कर।  परियों के बच्चों से प्रियतर,  फैला कोमल ध्वनियों के पर  कानों के भीतर उतर उतर 

माता-पिता – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

उसके ऐसा है नहीं अपनापन में आन। पिता आपही अवनि में हैं अपना उपमान।1। मिले न खोजे भी कहीं खोजा सकल जहान। माता सी ममतामयी पाता पिता समान।2। जो न पालता पिता क्यों पलना सकता पाल। माता के लालन बिना लाल न बनते लाल।3।

अज़ा में बहते थे आँसू – कैफ़ि आज़मी

अज़ा में बहते थे आँसू यहाँ, लहू तो नहीं  ये कोई और जगह है ये लखनऊ तो नहीं  यहाँ तो चलती हैं छुरिया ज़ुबाँ से पहले  ये मीर अनीस की, आतिश की गुफ़्तगू तो नहीं  चमक रहा है जो दामन पे दोनों फ़िरक़ों के  बग़ौर देखो ये इस्लाम का लहू तो नहीं

सौ बातों की एक बात है – रमानाथ अवस्थी

सौ बातों की एक बात है । रोज़ सवेरे रवि आता है दुनिया को दिन दे जाता है लेकिन जब तम इसे निगलता होती जग में किसे विकलता सुख के साथी तो अनगिन हैं लेकिन दुःख के बहुत कठिन हैं सौ बातो की एक बात है |

लहरों का गीत – सुमित्रानंदन पंत

अपने ही सुख से चिर चंचल हम खिल खिल पडती हैं प्रतिपल, जीवन के फेनिल मोती को ले ले चल करतल में टलमल!

अब तुम आग़ोश-ए-तसव्वुर – कैफ़ि आज़मी

अब तुम आग़ोश-ए-तसव्वुर में भी आया न करो  मुझ से बिखरे हुये गेसू नहीं देखे जाते  सुर्ख़ आँखों की क़सम काँपती पलकों की क़सम  थर-थराते हुये आँसू नहीं देखे जाते 

गुणगान – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

गणपति गौरी-पति गिरा गोपति गुरु गोविन्द। गुण गावो वन्दन करो पावन पद अरविन्द।1। देव भाव मन में भरे दल अदेव अहमेव। गिरि गुरुता से हैं अधिक गौरव में गुरुदेव।2। पाप-पुंज को पीस गुरु त्रिविध ताप कर दूर। हैं भरते उर-भवन में भक्ति-भाव भरपूर।3।

ऐसी तो कोई बात नहीं – रमानाथ अवस्थी

तुमसे भी छिपा सकूँ जो मै ऐसी तो कोई बात नहीं जीवन में | मन दिया तुम्हें मैंने ही अपने मन से रंग दिया तुम्हें मैंने अपने जीवन से बीते सपनो में आए बिना तुम्हारे ऐसी तो कोई रात नहीं जीवन में

सांध्य वंदना – सुमित्रानंदन पंत

जीवन का श्रम ताप हरो हे! सुख सुषुमा के मधुर स्वर्ण हे! सूने जग गृह द्वार भरो हे! लौटे गृह सब श्रान्त चराचर नीरव, तरु अधरों पर मर्मर, करुणानत निज कर पल्लव से विश्व नीड प्रच्छाय करो हे!

अंदेशे – कैफ़ि आज़मी

रूह बेचैन है इक दिल की अज़ीयत क्या है  दिल ही शोला है तो ये सोज़-ए-मोहब्बत क्या है वो मुझे भूल गई इसकी शिकायत क्या है रंज तो ये है के रो-रो के भुलाया होगा वो कहाँ और कहाँ काहिफ़-ए-ग़म सोज़िश-ए-जाँ उस की रंगीन नज़र और नुक़ूश-ए-हिरमा उस का एहसास-ए-लतीफ़ और शिकस्त-ए-अरमा तानाज़न एक ज़माना नज़र आया होगा