ऐसा कहीं होता नहीं ऐसा कभी होगा नहीं। धरती जले बरसे न घन, सुलगे चिता झुलसे न तन। औ ज़िंदगी में हों न ग़म। ऐसा कभी होगा नहीं ऐसा कभी होता नहीं।
कविता संग्रह
ऐ सबा – कैफ़ि आज़मी
ऐ सबा! लौट के किस शहर से तू आती है? तेरी हर लहर से बारूद की बू आती है! खून कहाँ बहता है इन्सान का पानी की तरह जिस से तू रोज़ यहाँ करके वजू आती है? धाज्जियाँ तूने नकाबों की गिनी तो होंगी यूँ ही लौट आती है या कर के रफ़ू आती
याद बन-बनकर गगन पर – रमानाथ अवस्थी
याद बन-बनकर गगन पर साँवले घन छा गए हैं ये किसी के प्यार का संदेश लाए या किसी के अश्रु ही परदेश आए । श्याम अंतर में गला शीशा दबाए उठ वियोगिनी देख घर मेहमान आए । धूल धोने पाँव की सागर गगन पर आ गए हैं
हमें नहीं चाहिए – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
आप रहे कोरा शरीर के बसन रँगावे। घर तज कर के घरबारी से भी बढ़ जावे। इस प्रकार का नहीं चाहिए हम को साधू। मन तो मूँड़ न सके मूँड़ को दौड़ मुड़ावे।1। मन का मोह न हरे, राल धान पर टपकावे। मुक्ति बहाने भूल भूलैयाँ बीच फँसावे। हमें चाहिए गुरू नहीं ऐसा अविवेकी। जो न लोक का रखे न तो परलोक बनावे।2।
एक बोसा – कैफ़ि आज़मी
जब भी चूम लेता हूँ उन हसीन आँखों को सौ चराग अँधेरे में जगमगाने लगते हैं फूल क्या शगूफे क्या चाँद क्या सितारे क्या सब रकीब कदमों पर सर झुकाने लगते हैं
हमें चाहिए – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
कपड़े रँग कर जो न कपट का जाल बिछावे। तन पर जो न विभूति पेट के लिए लगावे। हमें चाहिए सच्चे जी वाला वह साधू। जाति देश जगहित कर जो निज जन्म बनाये।1। देशकाल को देख चले निजता नहिं खोवे। सार वस्तु को कभी पखंडों में न डुबोवे। हमें चाहिए समझ बूझ वाला वह पंडित। आँखें ऊँची रखे कूपमंडूक न होवे।2।
अंधेरे का सफ़र – रमानाथ अवस्थी
तुम्हारी चाँदनी का क्या करूँ मैं अँधेरे का सफ़र मेरे लिए है किसी गुमनाम के दुख-सा अजाना है सफ़र मेरा पहाड़ी शाम-सा तुमने मुझे वीरान में घेरा तुम्हारी सेज को ही क्यों सजाऊँ समूचा ही शहर मेरे लिए है
इतना तो ज़िन्दगी में – कैफ़ि आज़मी
इतना तो ज़िन्दगी में किसी की ख़लल पड़े हँसने से हो सुकून ना रोने से कल पड़े जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी-पी के अश्क-ए-ग़म यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े एक तुम के तुम को फ़िक्र-ए-नशेब-ओ-फ़राज़ है एक हम के चल पड़े तो बहरहाल चल पड़े
लाचारी – रमानाथ अवस्थी
न जाने क्या लाचारी है आज मन भारी-भारी है हृदय से कहता हूँ कुछ गा प्राण की पीड़ित बीन बजा प्यास की बात न मुँह पर ला यहाँ तो सागर खारी है न जाने क्या लाचारी है आज मन भारी-भारी है
परिवर्तन – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
तिमिर तिरोहित हुए तिमिर-हर है दिखलाता। गत विभावरी हुए विभा बासर है पाता। टले मलिनता सकल दिशा है अमलिन होती। भगे तमीचर, नीरवता तमचुर-धवनि खोती। है वहाँ रुचिरता थीं जहाँ धाराएँ अरुचिर बहीं। कब परिवर्तन-मय जगत में परिवर्तन होता नहीं।1।



