कविता संग्रह

जीवन-मरण – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

पोर पोर में है भरी तोर मोर की ही बान मुँह चोर बने आन बान छोड़ बैठी है। कैसे भला बार बार मुँह की न खाते रहें सारी मरदानगी ही मुँह मोड़ बैठी है। हरिऔधा कोई कस कमर सताता क्यों न कायरता होड़ कर नाता जोड़ बैठी है। छूट चलती है आँख दोनों ही गयी है फूट हिन्दुओं में फूट आज पाँव तोड़ बैठी है।1।

गुरुदत्त के लिए नोहा – कैफ़ि आज़मी

रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुन्दर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई

मेरे पंख कट गये – रमानाथ अवस्थी

मेरे पंख कट गये हैं वरना मैं गगन को गाता। कोई मुझे सुनाओ फिर से वही कहानी, कैसे हुई थी मीरा घनश्याम की दीवानी। मीरा के गीत को भी कोई विष रहा सताता।

चींटी – सुमित्रानंदन पंत

चींटी को देखा? वह सरल, विरल, काली रेखा तम के तागे सी जो हिल-डुल, चलती लघु पद पल-पल मिल-जुल, यह है पिपीलिका पाँति! देखो ना, किस भाँति काम करती वह सतत, कन-कन कनके चुनती अविरत।

विद्यालय – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

है विद्यालय वही जो परम मंगलमय हो। बरविचार आकलित अलौकिक कीर्ति निलय हो। भावुकता बर वदन सुविकसित जिससे होवे। जिसकी शुचिता प्रीति वेलि प्रति उर में बोवे। पर अतुलित बल जिससे बने जाति बुध्दि अति बलवती। बहु लोकोत्तर फल लाभ कर हो भारत भुवि फलवती।1।

इब्ने-मरियम – कैफ़ि आज़मी

तुम ख़ुदा हो  ख़ुदा के बेटे हो या फ़क़त[2] अम्न[3] के पयंबर[4] हो या किसी का हसीं तख़य्युल[5] हो जो भी हो मुझ को अच्छे लगते हो जो भी हो मुझ को सच्चे लगते हो

मैं सदा बरसने वाला मेघ बनूँ – रमानाथ अवस्थी

मैं सदा बरसने वाला मेघ बनूँ तुम कभी न बुझने वाली प्यास बनो । संभव है बिना बुलाए तुम तक आऊँ हो सकता है कुछ कहे बिना फिर जाऊँ यों तो मैं सबको बहला ही लेता हूँ लेकिन अपना परिचय कम ही देता हूँ । मैं बनूँ तुम्हारे मन की सुन्दरता तुम कभी न थकने वाली साँस बनो।

विजय – सुमित्रानंदन पंत

मैं चिर श्रद्धा लेकर आई  वह साध बनी प्रिय परिचय में,  मैं भक्ति हृदय में भर लाई,  वह प्रीति बनी उर परिणय में।  जिज्ञासा से था आकुल मन  वह मिटी, हुई कब तन्मय मैं,  विश्वास माँगती थी प्रतिक्षण  आधार पा गई निश्चय मैं ! 

आवारा सजदे – कैफ़ि आज़मी

इक यही सोज़-ए-निहाँ कुल मेरा सरमाया है  दोस्तो मैं किसे ये सोज़-ए-निहाँ नज़र करूँ कोई क़ातिल सर-ए-मक़्तल नज़र आता ही नहीं किस को दिल नज़र करूँ और किसे जाँ नज़र करूँ?

उद्बोधन – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

वेदों की है न वह महिमा धर्म ध्वंस होता। आचारों का निपतन हुआ लुप्त जातीयता है। विप्रो खोलो नयन अब है आर्यता भी विपन्ना। शीलों की है मलिन प्रभुता सभ्यता वंचिता है।1। सच्चे भावों सहित जिन के राम ने पाँव पूजे। पाई धोके चरण जिन के कृष्ण ने अग्र पूजा। होते वांछा विवश इतने आज वे विप्र क्यों हैं। जिज्ञासू हो निकट जिन के बुध्द ने सिध्दि पाई।2।