कोई ये कैसे बता ये के वो तन्हा क्यों हैं वो जो अपना था वो ही और किसी का क्यों हैं यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यों हैं यही होता हैं तो आखिर यही होता क्यों हैं एक ज़रा हाथ बढ़ा, दे तो पकड़ लें दामन उसके सीने में समा जाये हमारी धड़कन इतनी क़ुर्बत हैं तो फिर फ़ासला इतना क्यों हैं
कविता संग्रह
दिल के फफोले -1 – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
जिसे सूझ कर भी नहीं सूझ पाता। नहीं बात बिगड़ी हुई जो बनाता। फिसल कर सँभलना जिसे है न आता। नहीं पाँव उखड़ा हुआ जो जमाता। पड़ेगा सुखों का उसे क्यों न लाला। सदा ही सहेगा न वह क्यों कसाला।
काफ़िला तो चले – कैफ़ि आज़मी
ख़ारो-ख़स[1] तो उठें, रास्ता तो चले मैं अगर थक गया, काफ़िला तो चले चाँद-सूरज बुजुर्गों के नक़्शे-क़दम ख़ैर बुझने दो इनको, हवा तो चले हाकिमे-शहर, ये भी कोई शहर है मस्जिदें बन्द हैं, मयकदा तो चले
कभी कभी – रमानाथ अवस्थी
कभी कभी जब मेरी तबियत यों ही घबराने लगती है तभी ज़िन्दगी मुझे न जाने क्या-क्या समझाने लगती है रात, रात भर को ही मिलती दिन भी मिलता दिन भर को कोई पूरी तरह न मिलता रमानाथ लौटो घर को
कुछ उलटी सीधी बातें – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
जला सब तेल दीया बुझ गया है अब जलेगा क्या। बना जब पेड़ उकठा काठ तब फूले फलेगा क्या।1। रहा जिसमें न दम जिसके लहू पर पड़ गया पाला। उसे पिटना पछड़ना ठोकरें खाना खलेगा क्या।2। भले ही बेटियाँ बहनें लुटें बरबाद हों बिगड़ें। कलेजा जब कि पत्थर बन गया है तब गलेगा क्या।3।
कभी जमूद कभी सिर्फ़ इंतिशार सा है – कैफ़ि आज़मी
कभी जमूद कभी सिर्फ़ इंतिशार सा है जहाँ को अपनी तबाही का इंतिज़ार सा है मनु की मछली, न कश्ती-ए-नूह और ये फ़ज़ा कि क़तरे-क़तरे में तूफ़ान बेक़रार सा है मैं किसको अपने गरेबाँ का चाक दिखलाऊँ कि आज दामन-ए-यज़दाँ भी तार-तार-सा है
इन्सान – रमानाथ अवस्थी
मैंने तोड़ा फूल, किसी ने कहा- फूल की तरह जियो औ मरो सदा इंसान । भूलकर वसुधा का शृंगार, सेज पर सोया जब संसार, दीप कुछ कहे बिना ही जला- रातभर तम पी-पीकर पला- दीप को देख, भर गए नयन उसी क्षण- बुझा दिया जब दीप, किसी ने कहा दीप की तरह जलो, तम हरो सदा इंसान ।
एक उकताया – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
क्या कहें कुछ कहा नहीं जाता। बिन कहे भी रहा नहीं जाता।1। बे तरह दुख रहा कलेजा है। दर्द अब तो सहा नहीं जाता।2। इन झड़ी बाँधा कर बरस जाते। आँसुओं में बहा नहीं जाता।3।
क्या होगा – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
बहँक कर चाल उलटी चल कहो तो काम क्या होगा। बड़ों का मुँह चिढ़ा करके बता दो नाम क्या होगा।1। बही जी में नहीं जो बेकसों के प्यार की धारा। बता दो तो बदन चिकना व गोरा चाम क्या होगा।2। दुखी बेवों यतीमों की कभी सुधा जो नहीं ली तो। जामा किस काम आवेगी व यह धान धाम क्या होगा।3।
औरत – कैफ़ि आज़मी
उठ मेरी जान!! मेरे साथ ही चलना है तुझे क़ल्ब-ए-माहौल[1] में लर्ज़ां[2] शरर-ए-जंग[3] हैं आज हौसले वक़्त के और ज़ीस्त[4] के यक-रंग हैं आज आबगीनों[5] में तपाँ[6] वलवला-ए-संग[7] हैं आज हुस्न और इश्क़ हम-आवाज़[8] ओ हम-आहंगल[9] हैं आज जिस में जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझे उठ मेरी जान!! मेरे साथ ही चलना है तुझे



