कविता संग्रह

द्वाभा के एकाकी प्रेमी – सुमित्रानंदन पंत

द्वाभा के एकाकी प्रेमी, नीरव दिगन्त के शब्द मौन, रवि के जाते, स्थल पर आते कहते तुम तम से चमक--कौन? सन्ध्या के सोने के नभ पर तुम उज्ज्वल हीरक सदृश जड़े, उदयाचल पर दीखते प्रात

खोलो, मुख से घूँघट खोलो – सुमित्रानंदन पंत

खोलो, मुख से घूँघट खोलो, हे चिर अवगुंठनमयि, बोलो! क्या तुम केवल चिर-अवगुंठन, अथवा भीतर जीवन-कम्पन? कल्पना मात्र मृदु देह-लता, पा ऊर्ध्व ब्रह्म, माया विनता! है स्पृश्य, स्पर्श का नहीं पता, है दृश्य, दृष्टि पर सके बता!

चरागाँ – कैफ़ि आज़मी

एक दो भी नहीं छब्बीस दिये एक इक करके जलाये मैंने इक दिया नाम का आज़ादी के उसने जलते हुये होठों से कहा चाहे जिस मुल्क से गेहूँ माँगो हाथ फैलाने की आज़ादी है

मन – रमानाथ अवस्थी

मन को वश में करो फिर चाहे जो करो । कर्ता तो और है रहता हर ठौर है वह सबके साथ है दूर नहीं पास है तुम उसका ध्यान धरो । फिर चाहे जो करो । सोच मत बीते को हार मत जीते को गगन कब झुकता है समय कब रुकता है समय से मत लड़ो । फिर चाहे जो करो । रात वाला सपना सवेरे कब अपना रोज़ यह होता है व्यर्थ क्यों रोता है डर के मत मरो । फिर चाहे जो करो ।

चाहिए – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

राह पर उसको लगाना चाहिए। जाति सोती है जगाना चाहिए।1। हम रहेंगे यों बिगड़ते कब तलक। बात बिगड़ी अब बनाना चाहिए।2। खा चुके हैं आज तक मुँह की न कम। सब दिनों मुँह की न खाना चाहिए।3।

ज़िन्दगी – कैफ़ि आज़मी

आज अन्धेरा मिरी नस-नस में उतर जाएगा आँखें बुझ जाएँगी बुझ जाएँगे एहसास ओ शुऊर और ये सदियों से जलता-सा सुलगता-सा वजूद इस से पहले कि सहर माथे पे शबनम छिड़के इस से पहले कि मिरी बेटी के वो फूल से हाथ गर्म रुख़्सार को ठण्डक बख़्शें इस से पहले कि मिरे बेटे का मज़बूत बदन तन-ए-मफ़्लूज में शक्ति भर दे इस से पहले कि मिरी बीवी के होंट

चुप रहिए – रमानाथ अवस्थी

देख रहे हैं जो भी, किसी से मत कहिए, मौसम ठीक नहीं है, आजकल चुप रहिए। कल कुछ देर किसी सूने में, मैंने कीं ख़ुद से कुछ बातें, लगा कि जैसे मुझे बुलाएँ बिन बाजों वाली बारातें। कोई नहीं मिला जो सुनता मुझसे मेरी हैरानी को, देखा सबने मुझे न देखा, मेरी आँखों के पानी को।

अपने दुखड़े – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

देश को जिस ने जगाया जगे सोने न दिया। आग घर घर में बुरी फूट को बोने न दिया।1। है वही बीर पिया दूध उसी ने माँ का। जाति को जिसने जिगर थाम के रोने न दिया।2। बन गये भोले बहुत, अपनी भलाई भूली। है इसी भूल ने अब तक भला होने न दिया।3।

चंदन – रमानाथ अवस्थी

चंदन है तो महकेगा ही आग में हो या आँचल में छिप न सकेगा रंग प्यार का चाहे लाख छिपाओ तुम कहने वाले सब कह देंगे कितना ही भरमाओ तुम घुंघरू है तो बोलेगा ही सेज में हो या साँकल में

चाँद की कटोरी – कुमार शान्तनु

इस रात मैं फिर तनहा कटोरी से अधूरे चाँद में अधूरे से अपने सपनो को छोटे छोटे जगमगाते तारों के नीचे अपनी आँखों को खोले देख रहा हूँ उस आधे कटोरी से चाँद से अँधेरे की तरह बिखर रहे अपने सपनो को समेट रहा हूँ