कविता संग्रह

तितली – सुमित्रानंदन पंत

नीली, पीली औ’ चटकीली पंखों की प्रिय पँखड़ियाँ खोल, प्रिय तिली! फूल-सी ही फूली तुम किस सुख में हो रही डोल? चाँदी-सा फैला है प्रकाश, चंचल अंचल-सा मलयानिल, है दमक रही दोपहरी में

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो – कैफ़ि आज़मी

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो  क्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो  आँखों में नमी हँसी लबों पर  क्या हाल है क्या दिखा रहे हो  बन जायेंगे ज़हर पीते पीते  ये अश्क जो पीते जा रहे हो 

धधक पौरुष की – विकास कुमार

मैं चला उस ओर जिधर सूर्य की किरणें असीम प्रसुप्त पौरुष की रगों में धधकाने ज्वाला असीम विकट हुआ प्रशीतन अब और चुप न रह पाऊंगा

जाना है दूर – रमानाथ अवस्थी

रोको मत जाने दो जाना है दूर वैसे तो जाने को मन ही होता नहीं, लेकिन है कौन यहाँ जो कुछ खोता नहीं  तुमसे मिलने का मन तो है मैं क्या करूँ? बोलो तुम कैसे कब तक मैं धीरज धरूँ । मुझसे मत पूछो मैं कितना मज़बूर । रोको मत जाने दो जाना है दूर

समझ का फेर – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

है भरी कूट कूट कोर कसर। माँ बहन से करें न क्यों कुट्टी। लोग सहयोग कर सकें कैसे। है असहयोग से नहीं छुट्टी।1। मेल बेमेल जाति से करके। हम मिटाते कलंक टीके हैं। जाति है जा रही मिटी तो क्या। रंग में मस्त यूनिटी के हैं।2।

सन्ध्या – सुमित्रानंदन पंत

कहो, तुम रूपसि कौन? व्योम से उतर रही चुपचाप छिपी निज छाया-छबि में आप, सुनहला फैला केश-कलाप,-- मधुर, मंथर, मृदु, मौन! मूँद अधरों में मधुपालाप

तुम – कैफ़ि आज़मी

शगुफ्तगी का लताफ़त का शाहकार हो तुम, फ़क़त बहार नहीं हासिल-ऐ-बहार हो तुम, जो इक फूल में है क़ैद वो गुलिस्तान हो, जो इक कली में है पिन्हाँ वो लाला-ज़ार हो तुम.

शून्य – विकास कुमार

रह गए हैं कुछ पीले पत्ते अधूरे ख्वाब बुझी  राख उजड़ा जमाना कातिल अकाल औऱ बिखरे तिनके मेरे भीतर मेरे जहन में बहुत अंदर तक। अब मैं मैं नहीं ना ही वो हरे भरे पत्ते हैं न ही वो संजीले ख्वाब हैं

रात की बात – रमानाथ अवस्थी

रात की बात, रात को होगी  दिन भर की आपाधापी से  मन का दर्पण धुँधलाया है । जिसने जितना दिया यहाँ पर  उसने उतना ही पाया है । सबकुछ पा लेने की धुन में  सबके सब दिखते हैं रोगी । 

उलटी समझ – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

जाति ममता मोल जो समझें नहीं। तो मिलों से हम करें मैला न मन। देश-हित का रंग न जो गाढ़ा चढ़ा। तो न डालें गाढ़ में गाढ़ा पहन।1। धूल झोंकें न जाति आँखों में। फाड़ देवें न लाज की चद्दर। दर बदर फिर न देश को कोसें। मूँद हित दर न दें पहन खद्दर।2।