जी लगा पोथी अपनी पढ़ो। केवल पढ़ो न पोथी ही को, मेरे प्यारे कढ़ो। कभी कुपथ में पाँव न डालो, सुपथ ओर ही बढ़ो। भावों की ऊँची चोटी पर बड़े चाव से चढ़ो। सुमति-खंजरी को मानवता-रुचि-चाम से मढ़ो। बन सोनार सम परम-मनोहर पर-हित गहने गढ़ो।1।
कविता संग्रह
मानव – सुमित्रानंदन पंत
सुन्दर हैं विहग, सुमन सुन्दर, मानव! तुम सबसे सुन्दरतम, निर्मित सबकी तिल-सुषमा से तुम निखिल सृष्टि में चिर निरुपम! यौवन-ज्वाला से वेष्टित तन, मृदु-त्वच, सौन्दर्य-प्ररोह अंग, न्योछावर जिन पर निखिल प्रकृति,
नीम से होकर निबोरी बनाते हैं पिता – विकास कुमार
पिता के महत्व को ना कम आंकिय माँ की हर ख़ुशी को पिता से भी बांटिए माँ यदि ममता है तो पिता पुरूषार्थ है पिता बिन जग में ना कोई परमार्थ है हर अर्थ व्यर्थ है यदि पिता असमर्थ है पिता से ही घर का हर कोना समर्थ है
जिसे नहीं कुछ चाहिए – रमानाथ अवस्थी
जिसे नहीं कुछ चाहिए, वही बड़ा धनवान । लेकिन धन से भी बड़ा, दुनिया में इन्सान । चारों तरफ़ मची यहाँ भारी रेलमपेल । चोर उचक्के ख़ुश बहुत, सज्जन काटें जेल । मतलब की सब दोस्ती देख लिया सौ बार । काम बनाकर हो गया, जिगरी दोस्त फ़रार ।
सेवा -1 – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
जो मिठाई में सुधा से है अधिक। खा सके वह रस भरा मेवा नहीं। तो भला जग में जिये तो क्या जिये। की गयी जो जाति की सेवा नहीं।1। हो न जिसमें जातिहित का रंग कुछ। बात वह जी में ठनी तो क्या ठनी। हो सकी जब देश की सेवा नहीं। तब भला हमसे बनी तो क्या बनी।2।
ताज – सुमित्रानंदन पंत
हाय! मृत्यु का ऐसा अमर, अपार्थिव पूजन? जब विषण्ण, निर्जीव पड़ा हो जग का जीवन! संग-सौध में हो शृंगार मरण का शोभन, नग्न, क्षुधातुर, वास-विहीन रहें जीवित जन?
दस्तूर क्या ये शहरे-सितमगर – कैफ़ि आज़मी
दस्तूर[1] क्या ये शहरे-सितमगर[2] के हो गए । जो सर उठा के निकले थे बे सर के हो गए । ये शहर तो है आप का, आवाज़ किस की थी देखा जो मुड़ के हमने तो पत्थर के हो गए ।
वह एक दर्पण चाहिए – रमानाथ अवस्थी
हर दर्द झूठा लग रहा सह कर मजा आता नहीं आँसू वही आँखें वही कुछ है ग़लत कुछ है सही जिसमें नया कुछ दिख सके वह एक दर्पण चाहिए राहें पुरानी पड़ गईं आख़िर मुसाफ़िर क्या करे! सम्भोग से संन्यास तक आवास से आकाश तक भटके हुए इनसान को कुछ और जीवन चाहिए!
तुम परेशां न हो – कैफ़ि आज़मी
तुम परेशां न हो बाब-ए-करम-वा न करो और कुछ देर पुकारूंगा चला जाऊंगा इसी कूचे में जहां चांद उगा करते थे शब-ए-तारीक गुज़ारूंगा चला जाऊंगा रास्ता भूल गया या यहां मंज़िल है मेरी कोई लाया है या ख़ुद आया हूं मालूम नहीं कहते हैं कि नज़रें भी हसीं होती हैं मैं भी कुछ लाया हूं क्या लाया मालूम नहीं
सेवा – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
देख पड़ी अनुराग-राग-रंजित रवितन में। छबि पाई भर विपुल-विभा नीलाभ-गगन में। बर-आभा कर दान ककुभ को दुति से दमकी। अन्तरिक्ष को चारु ज्योतिमयता दे चमकी। कर संक्रान्ति गिरि-सानु-सकल को कान्त दिखाई। शोभितकर तरुशिखा निराली-शोभा पाई। कलित बना कर कनक कलश को हुई कलित-तर। समधिक-धवलित सौधा-धाम कर बनी मनोहर।





