कविता संग्रह

गम रहा जब तक कि दम में दम रहा – मीर तकी “मीर”

ग़म रहा जब तक कि दम में दम रहा दिल के जाने का निहायत ग़म रहा  दिल न पहुँचा गोशा-ए-दामन तलक क़तरा-ए-ख़ूँ था मिज़्हा पे जम रहा

काले बादल – सुमित्रानंदन पंत

सुनता हूँ, मैंने भी देखा, काले बादल में रहती चाँदी की रेखा! काले बादल जाति द्वेष के, काले बादल विश्‍व क्‍लेश के, काले बादल उठते पथ पर नव स्‍वतंत्रता के प्रवेश के! सुनता आया हूँ, है देखा, काले बादल में हँसती चाँदी की रेखा

खार-ओ-खस तो उठें, रास्ता तो चले – कैफ़ि आज़मी

खार-ओ-खस तो उठें, रास्ता तो चले मैं अगर थक गया, काफ़ला तो चले चांद, सूरज, बुजुर्गों के नक्श-ए-क़दम खैर बुझने दो उनको हवा तो चले हाकिम-ए-शहर, यह भी कोई शहर है मस्जिदें बंद हैं, मैकदा तो चले

जग-जीवन – सुमित्रानंदन पंत

जग-जीवन में जो चिर महान, सौंदर्य-पूर्ण औ सत्‍य-प्राण, मैं उसका प्रेमी बनूँ, नाथ! जिसमें मानव-हित हो समान! जिससे जीवन में मिले शक्ति, छूटे भय, संशय, अंध-भक्ति; मैं वह प्रकाश बन सकूँ, नाथ!

कुसुम चयन – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

जो न बने वे विमल लसे विधु-मौलि मौलि पर। जो न बने रमणीय सज, रमा-रमण कलेवर। बर बृन्दारक बृन्द पूज जो बने न बन्दित। जो न सके अभिनन्दनीय को कर अभिनन्दित। जो विमुग्धा कर हुए वे न बन मंजुल-माला। जो उनसे सौरभित प्रेम का बना न प्याला। कर के नृप-कुल-तिलक क्रीट-रत्नों को रंजित। कर न सके जो कलित-कुसुम-कुल महिमा व्यंजित। जो न सुबासित हुआ तेल उनसे वह आला। जिसने सुखमय व्यथित-जीव-जीवन कर डाला।

नज़राना – कैफ़ि आज़मी

तुम परेशान न हो बाब-ए-करम वा न करो  और कुछ देर पुकारूँगा चला जाऊँगा  इसी कूचे में जहाँ चाँद उगा करते हैं शब-ए-तारीक गुज़ारूँगा चला जाऊँगा  रास्ता भूल गया या यहाँ मंज़िल है मेरी  कोई लाया है या ख़ुद आया हूँ मालूम नहीं  कहते हैं हुस्न कि नज़रें भी हसीं होती हैं  मैं भी कुछ लाया हूँ क्या लाया हूँ मालूम नहीं 

अविनय – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

ढाल पसीना जिसे बड़े प्यारों से पाला। जिसके तन में सींच सींच जीवन-रस डाला। सुअंकुरित अवलोक जिसे फूला न समाया। पा करके पल्लवित जिसे पुलकित हो आया। वह पौधा यदि न सुफल फले तो कदापि न कुफल फले। अवलोक निराशा का बदन नीर न आँखों से ढले।1।

दो-पहर – कैफ़ि आज़मी

ये जीत-हार तो इस दौर का मुक्द्दर है ये दौर जो के पुराना नही नया भी नहीं ये दौर जो सज़ा भी नही जज़ा भी नहीं ये दौर जिसका बा-जहिर कोइ खुदा भी नहीं तुम्हारी जीत अहम है ना मेरी हार अहम के इब्तिदा भी नहीं है ये इन्तेहा भी नहीं शुरु मारका-ए-जान अभी हुआ भी नहीं शुरु तो ये हंगाम-ए-फ़ैसला भी नहीं

भोर का उठना – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

भोर का उठना है उपकारी। जीवन-तरु जिससे पाता है हरियाली अति प्यारी। पा अनुपम पानिप तन बनता है बल-संचय-कारी। पुलकित, कुसुमित, सुरभित, हो जाती है जन-उर-क्यारी। लालिमा ज्यों नभ में छाती है। त्यों ही एक अनूठी धारा अवनी पर आती है। परम-रुचिरता-सहित सुधा-बृंदों सी बरसाती है। रसमय, मुदमय, मधुर नादमय सब ही दिशा बनाती है। तृण, वीरुधा, तरु, लता, वेलि को प्रतिपल पुलकाती है। बन उपवन में रुचिर मनोहर कुसुम-चय खिलाती है। प्रान्तर-नगर-ग्राम-गृह-पुर में सजीवता लाती है। उर में उमग पुलक तन में दुति दृग में उपजाती है। सदा भोर उठने वालों की यह प्यारी थाती है। यह न्यारी-निधि बड़े भाग वाली जनता पाती है।

दायरा – कैफ़ि आज़मी

रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे  फिर वहीं लौट के आ जाता हूँ  बारहा तोड़ चुका हूँ जिन को  इन्हीं दीवारों से टकराता हूँ  रोज़ बसते हैं कई शहर नये  रोज़ धरती में समा जाते हैं  ज़लज़लों में थी ज़रा सी गिरह  वो भी अब रोज़ ही आ जाते हैं