बालिका से वधू – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

माथे में सेंदूर पर छोटी दो बिंदी चमचम-सी,  पपनी पर आँसू की बूँदें  मोती-सी, शबनम-सी।  लदी हुई कलियों में मादक टहनी एक नरम-सी, यौवन की विनती-सी भोली, गुमसुम खड़ी शरम-सी।

आग की भीख – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

धुँधली हुईं दिशाएँ, छाने लगा कुहासा,  कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँ-सा।  कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है;  मुँह को छिपा तिमिर में क्यों तेज रो रहा है?  दाता, पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे,  बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे।  प्यारे स्वदेश के हित अंगार माँगता हूँ।  चढ़ती जवानियों का श्रृंगार मांगता हूँ। 

ध्वज-वंदना – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो! नमो नगाधिराज-शृंग की विहारिणी! नमो अनंत सौख्य-शक्ति-शील-धारिणी! प्रणय-प्रसारिणी, नमो अरिष्ट-वारिणी! नमो मनुष्य की शुभेषणा-प्रचारिणी! नवीन सूर्य की नई प्रभा, नमो, नमो! नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!

समुद्र का पानी – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

बहुत दूर पर  अट्टहास कर  सागर हँसता है।  दशन फेन के,  अधर व्योम के।  ऐसे में सुन्दरी! बेचने तू क्या निकली है,  अस्त-व्यस्त, झेलती हवाओं के झकोर सुकुमार वक्ष के फूलों पर ?

वातायन – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

मैं झरोखा हूँ।  कि जिसकी टेक लेकर  विश्व की हर चीज बाहर झाँकती है।  पर, नहीं मुझ पर,  झुका है विश्व तो उस जिन्दगी पर  जो मुझे छूकर सरकती जा रही है।

हिन्दी भाषा – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

पड़ने लगती है पियूष की शिर पर धारा। हो जाता है रुचिर ज्योति मय लोचन-तारा। बर बिनोद की लहर हृदय में है लहराती। कुछ बिजली सी दौड़ सब नसों में है जाती। आते ही मुख पर अति सुखद जिसका पावन नामही। इक्कीस कोटि-जन-पूजिता हिन्दी भाषा है वही।1। जिसने जग में जन्म दिया औ पोसा, पाला। जिसने यक यक लहू बूँद में जीवन डाला। उस माता के शुचि मुख से जो भाषा सीखी। उसके उर से लग जिसकी मधुराई चीखी। जिसके तुतला कर कथन से सुधाधार घर में बही। क्या उस भाषा का मोह कुछ हम लोगों को है नहीं।2।

झील – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

मत छुओ इस झील को।  कंकड़ी मारो नहीं,  पत्तियाँ डारो नहीं,  फूल मत बोरो।  और कागज की तरी इसमें नहीं छोड़ो। 

दिल्ली – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

यह कैसी चांदनी अम के मलिन तमिस्र गगन में कूक रही क्यों नियति व्यंग से इस गोधूलि-लगन में ? मरघट में तू साज रही दिल्ली कैसे श्रृंगार? यह बहार का स्वांग अरी इस उजड़े चमन में!

सजनि दीपक बार ले – महादेवी वर्मा

उर तिमिरमय घर तिमिरमय चल सजनि दीपक बार ले! राह में रो रो गये हैं रात और विहान तेरे काँच से टूटे पड़े यह  स्वप्न, भूलें, मान तेरे; फूलप्रिय पथ शूलमय पलकें बिछा सुकुमार ले!

बिना सूई की घड़ियाँ – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

हलके नीले और राख के से रंग में जो रँगी हुई। है नभ की दीवाल, वहाँ पर गोल घड़ी जो टँगी हुई।। अम्माँ देखो तो वह कितनी सुंदर चाँदी-सी उज्ज्वल। लगता जैसे वाच फैक्ट्री से आई हो अभी निकल।। पर अम्माँ यह घड़ी अजब है,