तीर पर कैसे रुकूँ मैं – हरिवंशराय बच्चन

तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों में निमंत्रण! रात का अंतिम प्रहर है, झिलमिलाते हैं सितारे, वक्ष पर युग बाहु बाँधे, मैं खड़ा सागर किनारे वेग से बहता प्रभंजन, केश-पट मेरे उड़ाता,

मेरा आँगन मेरा पेड़ – जावेद अख़्तर

मेरा आँगन कितना कुशादा कितना बड़ा था जिसमें मेरे सारे खेल समा जाते थे

परम्परा – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

परंपरा को अंधी लाठी से मत पीटो उसमें बहुत कुछ है जो जीवित है जीवन दायक है जैसे भी हो ध्वंस से बचा रखने लायक है

बंदर और मदारी – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

देखो लड़को, बंदर आया, एक मदारी उसको लाया। उसका है कुछ ढंग निराला, कानों में पहने है बाला। फटे-पुराने रंग-बिरंगे कपड़े हैं उसके बेढंगे। मुँह डरावना आँखें छोटी, लंबी दुम थोड़ी-सी मोटी।

जागो प्यारे – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

उठो लाल, अब आँखें खोलो, पानी लाई हूँ, मुँह धो लो। बीती रात, कमल-दल फूले, उनके ऊपर भौंरे झूले।

एक बूँद – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

ज्यों निकल कर बादलों की गोद से थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी सोचने फिर-फिर यही जी में लगी, आह! क्यों घर छोड़कर मैं यों कढ़ी?

मधुशाला – हरिवंशराय बच्चन

मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला, प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला, पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा, सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।

कृष्ण की चेतावनी – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

रामधारी सिंह 'दिनकर' जी का महाकाव्य कृष्ण की चेतावनी रामधारी सिंह 'दिनकर' जी के प्रसिध काव्यों में से एक "रश्मीरथि" की एक बड़ी लोकप्रिय कविता हैं | वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम, सह धूप-घाम, पानी-पत्थर, पांडव आये कुछ और निखर। सौभाग्य न सब दिन सोता है, देखें, आगे क्या होता है। मैत्री … Continue reading कृष्ण की चेतावनी – रामधारी सिंह ‘दिनकर’ →

एक तिनका – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

मैं घमंडों में भरा ऐंठा हुआ , एक दिन जब था मुंडेरे पर खड़ा । आ अचानक दूर से उड़ता हुआ , एक तिनका आँख में मेरी पड़ा । मैं झिझक कर हो उठा, बेचैन सा , लाल होकर आँख भी दुखने लगी । मूँठ देने , लोग कपड़े की लगे , ऐंठ बेचारी दबे … Continue reading एक तिनका – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ →

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती – हरिवंश राय बच्चन 

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है, चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है। मन का विश्वास रगों में साहस भरता है, चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है। आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती, कोशिश करने वालों की … Continue reading कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती – हरिवंश राय बच्चन  →