आरम्भ है प्रचण्ड, बोले मस्तकों के झुंड, आज ज़ंग की घड़ी की तुम गुहार दो आन बान शान या कि जान का हो दान आज इक धनुष के बाण पे उतार दो मन करे सो प्राण दे, जो मन करे सो प्राण ले, वही तो एक सर्वशक्तिमान है कृष्ण की पुकार है, ये भागवत का … Continue reading आरम्भ है प्रचण्ड – पियूष मिश्रा
Category: हिंदी कविताएँ
वीर तुम बढ़े चलो – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो ! हाथ में ध्वजा रहे बाल दल सजा रहे ध्वज कभी झुके नहीं दल कभी रुके नहीं वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो ! सामने पहाड़ हो सिंह की दहाड़ हो तुम निडर डरो नहीं तुम निडर डटो वहीं वीर तुम बढ़े चलो … Continue reading वीर तुम बढ़े चलो – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
सानवी सरीखी – विकाश कुमार
मेरी सरल कविता के अक्षर , गर पहुँच पाते अम्बर तेरी किलकारियाँ हरी भी सुनते, जड़ समान वशिभूत होकर । नन्ही नन्ही आँखों से , छु डाला मन के भीतर वो पहली मुस्कान तेरी , उज्जवल कर डाली हर दिशा प्रखर । एक कवि की कल्पना तू , एक गीत का तू स्वर मूर्तिकार की देवी … Continue reading सानवी सरीखी – विकाश कुमार
मन विचरण करता रहता है – ज्ञान प्रकाश सिंह
ऐसे ही विचरण करता मन पहुँच गया क्रीड़ास्थल पर, ऋषिमा जहाँ खेलने आती , अपनी मम्मी को संग लेकर । साधन वहाँ प्रतिस्थापित थे मन बहलाने हेतु अनेक किन्तु अनूठा दिखलाई , पड़ता था उनमें से एक । वह था एक अचेतन लेकिन , होता प्रतीत चेतन युक्त लहराता दोनों हाथों को मानो करता सबका … Continue reading मन विचरण करता रहता है – ज्ञान प्रकाश सिंह
मैं क्या क्या छोड़ आया हूँ – ज्ञान प्रकाश सिंह
क्लब के सामने ऋषिमा ने, जहाँ फ़ोटो खिंचाया था गमकते लहलहाते फूलों की क्यारी छोड़ आया हूँ । पैदल रास्ते पर रुक कर, जिसे ऋषिमा दिखाती थी पक्की सड़क के मोड़ पर, उस ‘जे’ को छोड़ आया हूँ । जिनकी ओट से बच्चे ने, हाइड-सीक खेला था बार-बी-क्यू के पास, … Continue reading मैं क्या क्या छोड़ आया हूँ – ज्ञान प्रकाश सिंह
सब याद है मुझको अब भी… – ज्ञान प्रकाश सिंह
ऋषिमा अब उस पते पर नहीं रहती किंतु सब याद है मुझको अब भी । फ़्लैट की बाल्कनी में खड़ी हो मेरे साथ जब भी , आते पवन के तेज़ झोंकों को ऊँचे स्वर में रुक जाने को कहती थी और जब तेज़ बारिश हो उसे जाने को कहती थी । ‘स्टॉप विंड , स्टॉप … Continue reading सब याद है मुझको अब भी… – ज्ञान प्रकाश सिंह
कुछ नहीं… – विकाश कुमार
जिया भी कुछ नहीं , किया भी कुछ नहीं... वो एक मौज आके यूँ गयी की... बहा भी कुछ नहीं , और रहा भी कुछ नहीं । लिया भी कुछ नहीं , दिया भी कुछ नहीं । रिश्तों का हिसाब करके देखा तो समझा... ख़र्चा भी कुछ नहीं , बचा भी कुछ नहीं । कहा भी … Continue reading कुछ नहीं… – विकाश कुमार

