कहो, तुम रूपसि कौन? व्योम से उतर रही चुपचाप छिपी निज छाया-छबि में आप, सुनहला फैला केश-कलाप,-- मधुर, मंथर, मृदु, मौन! मूँद अधरों में मधुपालाप
Category: हिंदी कविताएँ
शून्य – विकास कुमार
रह गए हैं कुछ पीले पत्ते अधूरे ख्वाब बुझी राख उजड़ा जमाना कातिल अकाल औऱ बिखरे तिनके मेरे भीतर मेरे जहन में बहुत अंदर तक। अब मैं मैं नहीं ना ही वो हरे भरे पत्ते हैं न ही वो संजीले ख्वाब हैं
रात की बात – रमानाथ अवस्थी
रात की बात, रात को होगी दिन भर की आपाधापी से मन का दर्पण धुँधलाया है । जिसने जितना दिया यहाँ पर उसने उतना ही पाया है । सबकुछ पा लेने की धुन में सबके सब दिखते हैं रोगी ।
उलटी समझ – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
जाति ममता मोल जो समझें नहीं। तो मिलों से हम करें मैला न मन। देश-हित का रंग न जो गाढ़ा चढ़ा। तो न डालें गाढ़ में गाढ़ा पहन।1। धूल झोंकें न जाति आँखों में। फाड़ देवें न लाज की चद्दर। दर बदर फिर न देश को कोसें। मूँद हित दर न दें पहन खद्दर।2।
द्वाभा के एकाकी प्रेमी – सुमित्रानंदन पंत
द्वाभा के एकाकी प्रेमी, नीरव दिगन्त के शब्द मौन, रवि के जाते, स्थल पर आते कहते तुम तम से चमक--कौन? सन्ध्या के सोने के नभ पर तुम उज्ज्वल हीरक सदृश जड़े, उदयाचल पर दीखते प्रात
खोलो, मुख से घूँघट खोलो – सुमित्रानंदन पंत
खोलो, मुख से घूँघट खोलो, हे चिर अवगुंठनमयि, बोलो! क्या तुम केवल चिर-अवगुंठन, अथवा भीतर जीवन-कम्पन? कल्पना मात्र मृदु देह-लता, पा ऊर्ध्व ब्रह्म, माया विनता! है स्पृश्य, स्पर्श का नहीं पता, है दृश्य, दृष्टि पर सके बता!
मन – रमानाथ अवस्थी
मन को वश में करो फिर चाहे जो करो । कर्ता तो और है रहता हर ठौर है वह सबके साथ है दूर नहीं पास है तुम उसका ध्यान धरो । फिर चाहे जो करो । सोच मत बीते को हार मत जीते को गगन कब झुकता है समय कब रुकता है समय से मत लड़ो । फिर चाहे जो करो । रात वाला सपना सवेरे कब अपना रोज़ यह होता है व्यर्थ क्यों रोता है डर के मत मरो । फिर चाहे जो करो ।
चाहिए – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
राह पर उसको लगाना चाहिए। जाति सोती है जगाना चाहिए।1। हम रहेंगे यों बिगड़ते कब तलक। बात बिगड़ी अब बनाना चाहिए।2। खा चुके हैं आज तक मुँह की न कम। सब दिनों मुँह की न खाना चाहिए।3।
चुप रहिए – रमानाथ अवस्थी
देख रहे हैं जो भी, किसी से मत कहिए, मौसम ठीक नहीं है, आजकल चुप रहिए। कल कुछ देर किसी सूने में, मैंने कीं ख़ुद से कुछ बातें, लगा कि जैसे मुझे बुलाएँ बिन बाजों वाली बारातें। कोई नहीं मिला जो सुनता मुझसे मेरी हैरानी को, देखा सबने मुझे न देखा, मेरी आँखों के पानी को।
अपने दुखड़े – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
देश को जिस ने जगाया जगे सोने न दिया। आग घर घर में बुरी फूट को बोने न दिया।1। है वही बीर पिया दूध उसी ने माँ का। जाति को जिसने जिगर थाम के रोने न दिया।2। बन गये भोले बहुत, अपनी भलाई भूली। है इसी भूल ने अब तक भला होने न दिया।3।




