नीम से होकर निबोरी बनाते हैं पिता – विकास कुमार

पिता के महत्व को ना कम आंकिय माँ की हर ख़ुशी को पिता से भी बांटिए माँ यदि ममता है तो पिता पुरूषार्थ है पिता बिन जग में ना कोई परमार्थ है हर अर्थ व्यर्थ है यदि पिता असमर्थ है पिता से ही घर का हर कोना समर्थ है

जिसे नहीं कुछ चाहिए – रमानाथ अवस्थी

जिसे नहीं कुछ चाहिए, वही बड़ा धनवान । लेकिन धन से भी बड़ा, दुनिया में इन्सान । चारों तरफ़ मची यहाँ भारी रेलमपेल । चोर उचक्के ख़ुश बहुत, सज्जन काटें जेल । मतलब की सब दोस्ती देख लिया सौ बार । काम बनाकर हो गया, जिगरी दोस्त फ़रार ।

सेवा -1 – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

जो मिठाई में सुधा से है अधिक। खा सके वह रस भरा मेवा नहीं। तो भला जग में जिये तो क्या जिये। की गयी जो जाति की सेवा नहीं।1। हो न जिसमें जातिहित का रंग कुछ। बात वह जी में ठनी तो क्या ठनी। हो सकी जब देश की सेवा नहीं। तब भला हमसे बनी तो क्या बनी।2।

ताज – सुमित्रानंदन पंत

हाय! मृत्यु का ऐसा अमर, अपार्थिव पूजन?  जब विषण्ण, निर्जीव पड़ा हो जग का जीवन!  संग-सौध में हो शृंगार मरण का शोभन,  नग्न, क्षुधातुर, वास-विहीन रहें जीवित जन? 

वह एक दर्पण चाहिए – रमानाथ अवस्थी

हर दर्द झूठा लग रहा सह कर मजा आता नहीं आँसू वही आँखें वही कुछ है ग़लत कुछ है सही जिसमें नया कुछ दिख सके वह एक दर्पण चाहिए राहें पुरानी पड़ गईं आख़िर मुसाफ़िर क्या करे! सम्भोग से संन्यास तक आवास से आकाश तक भटके हुए इनसान को कुछ और जीवन चाहिए!

सेवा – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

देख पड़ी अनुराग-राग-रंजित रवितन में। छबि पाई भर विपुल-विभा नीलाभ-गगन में। बर-आभा कर दान ककुभ को दुति से दमकी। अन्तरिक्ष को चारु ज्योतिमयता दे चमकी। कर संक्रान्ति गिरि-सानु-सकल को कान्त दिखाई। शोभितकर तरुशिखा निराली-शोभा पाई। कलित बना कर कनक कलश को हुई कलित-तर। समधिक-धवलित सौधा-धाम कर बनी मनोहर।

तितली – सुमित्रानंदन पंत

नीली, पीली औ’ चटकीली पंखों की प्रिय पँखड़ियाँ खोल, प्रिय तिली! फूल-सी ही फूली तुम किस सुख में हो रही डोल? चाँदी-सा फैला है प्रकाश, चंचल अंचल-सा मलयानिल, है दमक रही दोपहरी में

धधक पौरुष की – विकास कुमार

मैं चला उस ओर जिधर सूर्य की किरणें असीम प्रसुप्त पौरुष की रगों में धधकाने ज्वाला असीम विकट हुआ प्रशीतन अब और चुप न रह पाऊंगा

जाना है दूर – रमानाथ अवस्थी

रोको मत जाने दो जाना है दूर वैसे तो जाने को मन ही होता नहीं, लेकिन है कौन यहाँ जो कुछ खोता नहीं  तुमसे मिलने का मन तो है मैं क्या करूँ? बोलो तुम कैसे कब तक मैं धीरज धरूँ । मुझसे मत पूछो मैं कितना मज़बूर । रोको मत जाने दो जाना है दूर

समझ का फेर – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

है भरी कूट कूट कोर कसर। माँ बहन से करें न क्यों कुट्टी। लोग सहयोग कर सकें कैसे। है असहयोग से नहीं छुट्टी।1। मेल बेमेल जाति से करके। हम मिटाते कलंक टीके हैं। जाति है जा रही मिटी तो क्या। रंग में मस्त यूनिटी के हैं।2।