मा! मेरे जीवन की हार तेरा मंजुल हृदय-हार हो, अश्रु-कणों का यह उपहार; मेरे सफल-श्रमों का सार तेरे मस्तक का हो उज्जवल श्रम-जलमय मुक्तालंकार।
कविता संग्रह
मोह – सुमित्रानंदन पंत
छोड़ द्रुमों की मृदु-छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया, बाले! तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन? भूल अभी से इस जग को!
वसंत श्री – सुमित्रानंदन पंत
उस फैली हरियाली में, कौन अकेली खेल रही मा! वह अपनी वय-बाली में? सजा हृदय की थाली में
पल्लव – सुमित्रानंदन पंत
अरे! ये पल्लव-बाल! सजा सुमनों के सौरभ-हार गूँथते वे उपहार; अभी तो हैं ये नवल-प्रवाल, नहीं छूटो तरु-डाल;
चल मरदाने – हरिवंशराय बच्चन
चल मरदाने, सीना ताने, हाथ हिलाते, पाँव बढ़ाते, मन मुसकाते, गाते गीत।
उठो, धरा के अमर सपूतों – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो। जन-जन के जीवन में फिर से नव स्फूर्ति, नव प्राण भरो।
हम ऐसे आज़ाद हमारा झंडा है बादल – हरिवंशराय बच्चन
हम ऐसे आज़ाद हमारा झंडा है बादल। चाँदी सोने हीरे मोती से सजती गुड़ियाँ। इनसे आतंकित करने की बीत गई घड़ियाँ इनसे सज धज बैठा करते जो हैं कठपुतले हमने तोड़ अभी फेंकी हैं बेड़ी हथकड़ियाँ
बीते रिश्ते तलाश करती है – गुलज़ार
बीते रिश्ते तलाश करती है ख़ुशबू ग़ुंचे तलाश करती है
लकड़ी की काठी – गुलज़ार
लकड़ी की काठी, काठी पे घोड़ा घोड़े की दुम पे जो मारा हथौड़ा दौड़ा दौड़ा दौड़ा घोड़ा दुम उठा के दौड़ा
हम को मन की शक्ति देना – गुलज़ार
हम को मन की शक्ति देना, मन विजय करें दूसरो की जय से पहले, ख़ुद को जय करें।









