कविता संग्रह

दिल ही तो है – मिर्ज़ा ग़ालिब

दिल ही तो है न संग-ओ-ख़ीश्त दर्द से भर न आये क्यूँ रोयेंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताये क्यूँ

यूँ होता तो क्या होता – मिर्ज़ा ग़ालिब

न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता, डुबोया मुझको होने ने न मैं होता तो क्या होता !

जब यह दीप थके – महादेवी वर्मा

यह चंचल सपने भोले है, दृग-जल पर पाले मैने, मृदु पलकों पर तोले हैं; दे सौरभ के पंख इन्हें सब नयनों में पहुँचाना!

अलि, मैं कण-कण को जान चली – महादेवी वर्मा

अलि, मैं कण-कण को जान चली

किताबें – गुलज़ार

किताबें झाँकती हैं बंद आलमारी के शीशों से,  बड़ी हसरत से तकती हैं महीनों अब मुलाकातें नहीं होती जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं

आमों की तारीफ़ में – मिर्ज़ा ग़ालिब

हाँ दिल-ए-दर्दमंद ज़म-ज़मा साज़ क्यूँ न खोले दर-ए-ख़ज़िना-ए-राज़ ख़ामे का सफ़्हे पर रवाँ होना शाख़-ए-गुल का है गुल-फ़िशाँ होना

परिवर्तन – सुमित्रानंदन पंत

अहे निष्ठुर परिवर्तन! तुम्हारा ही तांडव नर्तन विश्व का करुण विवर्तन! तुम्हारा ही नयनोन्मीलन, निखिल उत्थान, पतन! अहे वासुकि सहस्र फन!

मौन-निमन्त्रण – सुमित्रानंदन पंत

स्तब्ध ज्योत्सना में जब संसार चकित रहता शिशु सा नादान , विश्व के पलकों पर सुकुमार विचरते हैं जब स्वप्न अजान,

याचना – सुमित्रानंदन पंत

बना मधुर मेरा जीवन! नव नव सुमनों से चुन चुन कर धूलि, सुरभि, मधुरस, हिम-कण, मेरे उर की मृदु-कलिका में भरदे, करदे विकसित मन।

झर पड़ता जीवन डाली से – सुमित्रानंदन पंत

झर पड़ता जीवन-डाली से मैं पतझड़ का-सा जीर्ण-पात!-- केवल, केवल जग-कानन में लाने फिर से मधु का प्रभात!