बेखुदी ले गयी कहाँ हम को देर से इंतज़ार है अपना रोते फिरते हैं सारी-सारी रात अब यही रोज़गार है अपना
कविता संग्रह
पूरा दिन – गुलज़ार
मुझे खर्ची में पूरा एक दिन, हर रोज़ मिलता है मगर हर रोज़ कोई छीन लेता है, झपट लेता है, अंटी से कभी खीसे से गिर पड़ता है तो गिरने की आहट भी नहीं होती,
ये न थी हमारी क़िस्मत – मिर्ज़ा ग़ालिब
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता तेरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूट जाना कि ख़ुशी से मर न जाते अगर एतबार होता
कोहरे के खेत – कैफ़ि आज़मी
वो सर्द रात जबकि सफ़र कर रहा था मैं रंगीनियों से जर्फ़-ए-नज़र भर रहा था मैं
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी – मिर्ज़ा ग़ालिब
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी के हर ख़्वाहिश पे दम निकले बहुत निकले मेरे अरमाँ लेकिन फिर भी कम निकले निकलना खुळ से आदम का सुनते आये हैं लेकिन बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले
मुझे नहीं पता – कुमार शान्तनु
ये जो बतियाँ जग रही है राहों पर ये रौशनी दे रही है या अँधेरा मुझे नहीं पता
कहा मैंने – मीर तकी “मीर”
कहा मैंने कितना है गुल का सबात कली ने यह सुनकर तब्बसुम किया जिगर ही में एक क़तरा खूं है सरकश पलक तक गया तो तलातुम किया
आए हैं मीर मुँह को बनाए – मीर तकी “मीर”
आए हैं मीर मुँह को बनाए जफ़ा से आज शायद बिगड़ गयी है उस बेवफा से आज जीने में इख्तियार नहीं वरना हमनशीं हम चाहते हैं मौत तो अपने खुदा से आज
ग़म मौत का नहीं है – गुलज़ार
ग़म मौत का नहीं है, ग़म ये के आखिरी वक़्त भी तू मेरे घर नहीं है.... निचोड़ अपनी आँखों को,
झुकी झुकी सी नज़र – कैफ़ि आज़मी
झुकी झुकी सी नज़र बेक़रार है कि नहीं दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं










