गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले
कविता संग्रह
अश्क आंखों में कब नहीं आता – मीर तकी “मीर”
अश्क आंखों में कब नहीं आता लहू आता है जब नहीं आता
इब्तिदा-ऐ-इश्क है रोता है क्या – मीर तकी “मीर”
इब्तिदा-ऐ-इश्क है रोता है क्या आगे आगे देखिये होता है क्या
बेखुदी कहाँ ले गई हमको – मीर तकी “मीर”
बेखुदी कहाँ ले गई हमको, देर से इंतज़ार है अपना
फ़क़ीराना आए सदा कर चले – मीर तकी “मीर”
फ़क़ीराना आए सदा कर चले मियाँ खुश रहो हम दुआ कर चले
हस्ती अपनी हुबाब की सी है – मीर तकी “मीर”
हस्ती अपनी हुबाब की सी है । ये नुमाइश सराब की सी है ।।
हे सागर वासी घन काले ! – ज्ञान प्रकाश सिंह
जब ज्वालाओं के जाल फेंकते,भुवन भास्कर धरती पर तब ग्रीष्मकाल की भरी दुपहरी,आग बरसती धरती पर जीव जंतु बेहाल ताप से , चैन नहीं मिलता घर बाहर ताक रहे सब सूने नभ को मन में आस तुम्हारी पाले।
अपने तड़पने की मैं तदबीर पहले कर लूँ – मीर तकी “मीर”
अपने तड़पने की मैं तदबीर पहले कर लूँ तब फ़िक्र मैं करूँगा ज़ख़्मों को भी रफू का।
मधुकर ! तब तुम गुंजन करना – ज्ञान प्रकाश सिंह
भँवरा ! ये दिन कठिन हैं पर फिर वसंत ऋतु आएगी, नवकुसुम खिलेंगे उपवन में, नवगीत कोकिला गाएगी।
रात चुपचाप दबे पाँव चली जाती है – गुलज़ार
रात चुपचाप दबे पाँव चली जाती है रात ख़ामोश है रोती नहीं हँसती भी नहीं






