कविता संग्रह

गुलों में रंग भरे – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

अश्क आंखों में कब नहीं आता – मीर तकी “मीर”

अश्क आंखों में कब नहीं आता  लहू आता है जब नहीं आता

इब्तिदा-ऐ-इश्क है रोता है क्या – मीर तकी “मीर”

इब्तिदा-ऐ-इश्क है रोता है क्या आगे आगे देखिये होता है क्या

बेखुदी कहाँ ले गई हमको – मीर तकी “मीर”

बेखुदी कहाँ ले गई हमको, देर से इंतज़ार है अपना

फ़क़ीराना आए सदा कर चले – मीर तकी “मीर”

फ़क़ीराना आए सदा कर चले मियाँ खुश रहो हम दुआ कर चले

हस्ती अपनी हुबाब की सी है – मीर तकी “मीर”

हस्ती अपनी हुबाब की सी है । ये नुमाइश सराब की सी है ।। 

हे सागर वासी घन काले ! –  ज्ञान प्रकाश सिंह

जब ज्वालाओं के जाल फेंकते,भुवन भास्कर धरती पर तब ग्रीष्मकाल की भरी दुपहरी,आग बरसती धरती पर जीव जंतु बेहाल ताप से , चैन नहीं मिलता घर बाहर ताक रहे सब सूने नभ को मन में आस तुम्हारी पाले।

अपने तड़पने की मैं तदबीर पहले कर लूँ – मीर तकी “मीर”

अपने तड़पने की मैं तदबीर पहले कर लूँ तब फ़िक्र मैं करूँगा ज़ख़्मों को भी रफू का।

मधुकर ! तब तुम गुंजन करना –  ज्ञान प्रकाश सिंह

भँवरा ! ये दिन कठिन हैं  पर फिर वसंत ऋतु आएगी, नवकुसुम खिलेंगे उपवन में, नवगीत कोकिला गाएगी।

रात चुपचाप दबे पाँव चली जाती है – गुलज़ार

रात चुपचाप दबे पाँव चली जाती है रात ख़ामोश है रोती नहीं हँसती भी नहीं