कविता संग्रह

दिया है दिल – मिर्ज़ा ग़ालिब

दिया है दिल अगर उस को , बशर है क्या कहिये हुआ रक़ीब तो वो , नामाबर है , क्या कहिये यह ज़िद की आज न आये और आये बिन न रहे काजा से शिकवा हमें किस क़दर है , क्या कहिये

अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा – मिर्ज़ा ग़ालिब

अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नहीं रहा जाता हूँ दाग़-ए-हसरत-ए-हस्ती लिये हुए हूँ शम्मा-ए-कुश्ता दरख़ुर-ए-महफ़िल नहीं रहा

हुस्ना – पीयूष मिश्रा

लाहौर के उस पहले जिले के दो परगना में पहुंचे रेशम गली के दूजे कूचे के चौथे मकां में पहुंचे

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है – मिर्ज़ा ग़ालिब

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है? तुम ही कहो कि ये अंदाज़-ए-ग़ुफ़्तगू क्या है?

शायद मैं …सही था – कुमार शान्तनु

उस दिन जाने से पहले वो कुछ कहना चाहती थी पर मैं उसकी बोलती आँखों को सुन ही नहीं पाया

मेरे कुछ सवाल हैं – ज़ाकिर खान

मेरे कुछ सवाल हैं जो सिर्फ़ क़यामत के रोज़ पूछूँगा तुमसे, क्यूँकि उसके पहले तुम्हारी और मेरी बात हो सके इस लायक नहीं हो तुम । 

मैं और मेरी कॉफ़ी (कहानी) – कुमार शान्तनु

लव बींस (love beans) तनहा सा रहता था मैं इस तनहा शहर में, कभी खुद से छिपता , कभी खुद से मिलता था। अक्सर देर से सोता था , देर से उठता था। न जाने कितने बरस हो गए थे मुझ जैसे आलसी को सुबह सवेरे की दुनिया देखे सुने । आज बैठा हूँ हाथ में कॉफ़ी (coffee-) का … Continue reading मैं और मेरी कॉफ़ी (कहानी) – कुमार शान्तनु →

घर लौटने में अब ज़माने निकल जाएँगे  – विकाश कुमार

शहर बदला हम फिर कमाने निकल जाएँगे   घर लौटने में अब ज़माने निकल जाएँगे 

चलो फिर से मुस्कुराएं – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

जो गुज़र गयी हैं रातें उन्हें फिर जगा के लाएं जो बिसर गयी हैं बातें उन्हें याद में बुलायें

कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

वो लोग बहुत ख़ुशक़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते जी मसरूफ़ रहे