पर्वत पर, शायद, वृक्ष न कोई शेष बचा, धरती पर, शायद, शेष बची है नहीं घास; उड़ गया भाप बनकर सरिताओं का पानी, बाकी न सितारे बचे चाँद के आस-पास ।
कविता संग्रह
स्मॅाग – ज्ञान प्रकाश सिंह
ये कैसी धुँध छाई, ये धुआँ कहाँ से आया? मंत्री जी से जब पूछा, ये कैसी धुँध आई बोले, लोकतान्त्रिक है, सब पर है छाई, अमीर और ग़रीब में, फ़र्क नहीं करती इसीलिए तो हमने एनसीआर में बुलाया। ये कैसी धुँध छाई, ये धुआँ कहाँ से आया?
लेन-देन – रामधारी सिंह ‘दिनकर’
लेन-देन का हिसाब लंबा और पुराना है। जिनका कर्ज हमने खाया था, उनका बाकी हम चुकाने आये हैं। और जिन्होंने हमारा कर्ज खाया था, उनसे हम अपना हक पाने आये हैं।
गीत, अगीत – रामधारी सिंह ‘दिनकर’
गीत, अगीत, कौन सुंदर है? गाकर गीत विरह की तटिनी वेगवती बहती जाती है, दिल हलका कर लेने को उपलों से कुछ कहती जाती है। तट पर एक गुलाब सोचता, "देते स्वर यदि मुझे विधाता,
विदा लाडो – कुमार विश्वास
विदा लाडो! तुम्हे कभी देखा नहीं गुड़िया, तुमसे कभी मिला नहीं लाडो! मेरी अपनी दुनिया की अनोखी उलझनों में और तुम्हारी ख़ुद की थपकियों से गढ़ रही तुम्हारी अपनी दुनिया की छोटी-छोटी सी घटत-बढ़त में,
शक्ति और क्षमा – रामधारी सिंह ‘दिनकर’
क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल सबका लिया सहारा पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे कहो, कहाँ, कब हारा?
कलम, आज उनकी जय बोल – रामधारी सिंह ‘दिनकर’
जला अस्थियाँ बारी-बारी चिटकाई जिनमें चिंगारी, जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर लिए बिना गर्दन का मोल कलम, आज उनकी जय बोल।
नेहरू – कैफ़ि आज़मी
मैं ने तन्हा कभी उस को देखा नहीं फिर भी जब उस को देखा वो तन्हा मिला जैसे सहरा में चश्मा कहीं या समुन्दर में मीनार-ए-नूर या कोई फ़िक्र-ए-औहाम में फ़िक्र सदियों अकेली अकेली रही ज़ेहन सदियों अकेला अकेला मिला
आशा का दीपक – रामधारी सिंह ‘दिनकर’
यह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नहीं है थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नहीं है चिन्गारी बन गयी लहू की बून्द गिरी जो पग से चमक रहे पीछे मुड देखो चरण-चिनह जगमग से शुरू हुई आराध्य भूमि यह क्लांत नहीं रे राही; और नहीं तो पाँव लगे हैं क्यों पड़ने डगमग से
आओ फिर से दिया जलाएँ – अटल बिहारी वाजपेयी
आओ फिर से दिया जलाएँ भरी दुपहरी में अंधियारा सूरज परछाई से हारा अंतरतम का नेह निचोड़ें- बुझी हुई बाती सुलगाएँ। आओ फिर से दिया जलाएँ





