कविता संग्रह

कच्ची उम्र के पक्के साथी – ज्ञान प्रकाश सिंह

वह उम्र भले ही कच्ची थी, पर तब के साथी पक्के थे।  वह निश्छलता की दुनिया थी जिससे पटती दिल से पटती  वे हमको अच्छे लगते थे, हम उनको अच्छे लगते थे।  वह उम्र भले ही कच्ची थी, पर तब के साथी पक्के थे।  वह स्वार्थ रहित नाता होता, भोला होता भावुक होता 

वीर – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

सच है, विपत्ति जब आती है,  कायर को ही दहलाती है,  सूरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते, विघ्नों को गले लगाते हैं, काँटों में राह बनाते हैं। 

कविता का फास्ट फूड – ज्ञान प्रकाश सिंह

शीघ्रता की साधना, असिद्ध करती जा रही है,  धैर्य की अवधारणा अब लुप्त होती जा रही है।    विश्वअंतर्जाल रचना जब से हुई है अवतरित,  सूचना तकनीक तब से हो रही है विस्तारित। विश्व होता जा रहा है विश्वव्यापी जाल शासित, संबंधों की दृढ़ता को तय कर रहा है ‘लाइक’। हृदयगत सम्वेदना अब दूर होती जा रही है,  धैर्य की अवधारणा अब लुप्त होती जा रही है। 

पढ़क्‍कू की सूझ – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

एक पढ़क्‍कू बड़े तेज थे, तर्कशास्‍त्र पढ़ते थे, जहाँ न कोई बात, वहाँ भी नए बात गढ़ते थे। एक रोज़ वे पड़े फिक्र में समझ नहीं कुछ न पाए, "बैल घुमता है कोल्‍हू में कैसे बिना चलाए?"

टैन्जेंट – ज्ञान प्रकाश सिंह

समानान्तर रेखाओं से तो  तिर्यक रेखायें अच्छी है  जो आपस में टकराती हैं  लड़ती हैं तथा झगड़ती हैं और कभी टैन्जेंट हुईं तो  कोमलता से छूती हैं ।

विजयी के सदृश जियो रे – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

वैराग्य छोड़ बाँहों की विभा संभालो  चट्टानों की छाती से दूध निकालो  है रुकी जहाँ भी धार शिलाएं तोड़ो  पीयूष चन्द्रमाओं का पकड़ निचोड़ो  चढ़ तुंग शैल शिखरों पर सोम पियो रे  योगियों नहीं विजयी के सदृश जियो रे! 

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,  आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!  उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,  और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।  जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?  मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते;  और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी  चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते। 

लोहे के मर्द – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

पुरुष वीर बलवान, देश की शान, हमारे नौजवान घायल होकर आये हैं। कहते हैं, ये पुष्प, दीप, अक्षत क्यों लाये हो?

जब तुम आये – ज्ञान प्रकाश सिंह

धीरे से खोल कपाटों को, नीरवता से जब तुम आये,  चमकी हो चपला जैसे, चितवन में विद्युत भर लाये। जब तुम आये, जैसे रचना चित्र कल्पना, जैसे जटिल जाल स्मृति के  भाषा के अपठित भावों के, प्रश्न लिए पलकों पर आये।  जब तुम आये,

तुषार कणिका –  ज्ञान प्रकाश सिंह

नव प्रभात का हुआ आगमन  है उपवन अंचल स्तंभित  पुष्प लताओं के झुरमुट में  छिपकर बैठी  हरित पत्र पर  बूँद ओस की  ज्योतित निर्मल